Friday, April 24, 2009

बोडी की छबीस जनबरी !

२९ दिसम्बर, १९९५, वै टैम परैं श्रीनगर बिटिकी दिल्ली तक की उत्तरप्रदेश रोडवेज की सीधी बस सेवा छै।  तब मेरु नौनु तीन सालौ कु छौ, ये वास्ता तबारी हम तैं स्कूल-उस्कूल कु क्वी झंझट नी छौ।   परिवार तैं हरिद्वार अपना रिश्तेदारुका पास छोडिकी, मैं एक दिन का वास्ता श्रीनगर गै छौं। लौट्दी दा मैन हरिद्वार तकौ तै सुबेर छै बजी वाली श्रीनगर-दिल्ली वाली रोडवेज की बस पकड़ी छै।  सात बजी का करीब गाडी देवप्रयाग का धोरा पौछि।   मैं कंडक्टर का बगल वाली सीट मा ही बैठ्युं छौ। जख्मु बिटिकी एक सड़क हिंदोलाखाल कु तै कटदी वख वै मोड़ परैं अचानक ड्राइवरन ब्रेक लगैन।   कंडक्टरन दरवाजू खोली त भैर बिटिकी एक साठ-पैसठ साल की वृद्धा एक कुट्यारु जनु थैलू पकडीक खड़ी छै, और फिर वीन पूछी; "बबा या गाडी दिल्ली होली जाणी" कंडक्टर का बोलण सी पैली मिन जबाब दिनी " हाँ बोड़ी जी , या दिल्ली वाली बस च, आपन कख जाण? " बोड़ीन इत्गा सूणी  अर वांका बाद फटाफट गाडी का भीतर औणकु तै अप्णि लाठी और खुट्टी अगनै सीड्यो मा बढ़ेंन और बोली क़ि बबा मैन दिल्ली जाण! गाडी मा चौडिकी वा बोड़ी मेरी पिछ्नै वाली सीट मा बैठीगे।  

गाडी अग्ने बढ़ी, और फिर एक-डेड घंटा का बाद व्यासी पौंछंण पर वखमु चा-पाणी पेण का वास्ता रुकिगे।  लगभग सब्बी  सवारी भैर उतरिगैन, मैं भी अपणी सीट मकै भैर उतर्न का वास्ता खडू होंयु और मैन पूछि; 
"बोड़ीजी आपन भी पेण चा-पाणी कुछ ?" 
बोड़ी:  न बबा मैं तै उल्टी होंदी !
मैं ई सूणिक तै मन ही मन हैरान छौं कि वा बोड़ी अकेला दिल्ली छै जाणी, ये वास्ता मेरा भीतर काफी कौतुहल छौ।  अत:  मैन फिर पूछी; 
"बोड़ी दिल्ली कै काम सी छा जाणा आप ?
बोड़ी: बाबा मेरु नौनु रंदु तख, मैं छबीसजनबरी देखणाकु तै छौ जाणू।  मैनाग रालू नौना मु अर् छबीसजनबरी देखीग घौर एई जालु। 
कै जगा रंदन आपका लड़का दिल्ली मा बोड़ी ? मैन फ्योर पूछी।
बोड़ी: जादा पता त मैं नी मालूम बबा, पर इन छौ नौनु बोल्णु कि वू विनोद नगर मा रन्दू।  
आप पैली भी रए कभी दिल्ली मा ? मैन फ्योर पूछी।
बोड़ी: न बबा, पैली दा ही छौ जाणू।  
आपन अपना नौना तैंत बतै याली होलू कि आप वख दिल्ली छा औंणा, ताकि उ वख बस अड्डा पर राला अयाँ, आपतै लेणकु ? 
बोड़ी: कुजाणी बबा, लेंणकु तै औंदु कि नि औंदु, पिछली दा जबारी छुट्टी ए छौ तबारी बोली छौ तैन कि माँ, इबारी दा त्वै दगडी क्वी दगडू होलू त छबीसजनबरी देखण कु दिल्ली ऐ जे।  अब दगडू त मैतै क्वी मिली नी इ वास्ता आफी लग्युं बाट्टा, अब जू भी होलू दिक्खे जालु, वैगु पता धार्यु च मेरु आफुमु, कै तै पूछि-जांचिकि पौंछी जालु।  

बोड़ी की इत्गा बात सुणण छै मिन कि मेरा पूरा शरीर मा एक कंपकपी सी दौडिगे।  अकेला कन मा जाली या बूढीड़ दिल्ली मा, मैं यूँ ख्यालू मा ही डुव्युं छौ कि तबारी बोड़ीन पूछि " बाबा तू कख रैंदी, तिन कख तक जाण ?
बोड़ी रैंदु त मैं भी दिल्ली छौं पर.....(बोडीन मेरी बात काटिकि बोली) हे बाबा,  फिरत मी तै भी दगडू हवैगी... मिन नोट करी कि बोड़ी की मुखडी पर एक चमक सी एगी छै।  मिन बोली, बोड़ी आपन मेरी पूरी बात नी सूंणी, मैंन भी जाण त दिल्ली च पर अभ्भि सीधू नी छौं मी वख जाणु।   मेरा अपना बच्चा छन छोड्या हरिद्वार रिश्तेदारुका पास।  ऊन ताख अभी एक हफ्ता रुकण, वांगा बाद औला हम दिल्ली।   मेरी बात सुणण का बाद बोड़ी कु चेहरा फिर मुर्झैगी छौ ! मेरु दिमाग भी तेजी सी दौडंण लग्यु छौ कि ईं बुढ़िडयो क्या किये जौ ? बोड़ी तै आफु दग्ड़ी  एक हफ्ता का वास्ता हरिद्वार ही रुकै देन्दु और जब हम जौला तब बढ़डी तै भी दगडा मा लिजैकि  बुढडी तै वींगा नौना मु छोडीक तै ए जाला।   परन्तु फ्यौर ख्य़ाल आई कि एक त मेरा बच्चा भी रिश्तादारुका यख छन और दगडा मा मैं यी बुढडी तै भी हफ्ता रोजकू तै वख ली जालु त वू लोग क्या सोचला।   

फिर मै बोडी तै सम्झ्हौण लग्यु कि बोडी आप इन अकेला न जा दिल्ली, वख अच्छा खासा लोग धोखा खै जान्दन, बिरिडी जान्दन, त आप त जनाना जात छा, आप यक्खी मु बिटीक घौर लौटि जा, मै बिठै देलु आपतै देप्रयागै गाडी मा।  बोडी: न बबा, मेरी त इबारीदा धारणा धारींच कि मैन छबीसजन्बरी देखीक ही औण।   अब मिन घौर बिटी अपरु लाठु-छतुरु उठै ही यालि त अब जु भी होलु, जाण दी ,फुन्ड फूक…!

मै बोडी दग्डी यु छुंयों मा ही रैग्यु और गाडि फिर चल्ण लगी छै ! मै सम्झीगि छौ कि बोडी तै सम्झौण कु क्वी फैदा नी च ! पर मेरा भितर एक उथल-पुथल सी मचीं छै, बार-बार कभी हरिद्वार सी दिल्ली तकौ पूरु रस्ता मेरी आखों मा ऐ जान्दु छौ, त कबारि दिल्ली कु आईएसबीटी वालु बस अड्डा, कभी दिल्ली की सड्कु कु ट्रेफिक, त कभी दिल्ली का लोग ! मैन आपरु मुन्ड घुमाइकि तै पूरि गाडी की सवारियो कु मुऐना करी, मेरि नजर कै इना आदमी तै ढूडणी छै, जु विस्वासपात्र हो और बोडी तै दिल्ली मा कुछ मदद कर सकु ! हरिद्वार उतर्न सी पैली मैन अपना दिल की तसल्ली का वास्ता द्वी इना लोग ढूँढली छा , जौन दिल्ली जाण छौ अर् आईएसबीटी उतर्न छौ ! मैन वू द्वी लोगु सी विनती कारीग तै यु पक्कू करियाली छौ की वू बोड़ी तै बस अड्डा का भैर बिटिकी ऑटो माँ बिठालीक तै ऑटो वाला तै ढंग सी सम्झै दये की वू बोड़ी तै वींगा नौना गा पता पर घर तक छोडू ! फिर मैन बोड़ी कु परिचय, वू द्वी लोगु सी करै और बोड़ी तै समझौण का बाद हरिद्वार उतरीग्यु !

एक हफ्ता हरिद्वार रुकण का बाद मैं दिल्ली आई ग्यों ! मेरा बच्चा एक हफ्ता और का वास्ता हरिद्वार ही रुकिगी छा, किलायिकि रेश्तेदारून जोर करी कि अगल्य हफ्ता वू लोगुन भी दिल्ली आण, एक व्यो मा शामिल होंण कु, ये वास्ता मेरा बच्चा भी वू दगडी मा आला! वू दिनु मै लक्ष्मीनगर मा विजय चौक पर किराया का मकान पर रंदु छायो! मैन हरिद्वार बिटीकी सुबेर की बस पकडी छाई ये वास्ता मै करीब एक बजी अपणा क्वाटर पर पौन्छिगी छौ ! मै मकान की दुसरी मंजिल पर रंदु छायु ,जख मा आधा छत पर द्वी कमरा किचन कु सेट छौ और आधा छत खाली छाई ! ठंडीयों का दिन और सफ़र की थकान होंण का वजह सी मै थोड़ी देर का वास्ता कमरा पर रजाई ओढिकी सेइ गयु ! अभी मै तै लेट्या थोडा ही देर ह्वै छाई कि अचानक छत मा लोगु की आवाज सुणीक मै उठी गयु ! भैर ऐकतै देखि त तैल्या माला पर रण वाला मकान मालिक का सभी बाल-बच्चा छत मा खडू ह्वैक, नीस विजय चौक पर लगी भीड़ कु तमासु देखणा छा! मैन भैर छत मा ऐकि तै मकान मालिकै बडा नौने की ब्वारि तै पूछि, क्या हुआ भाभी जी क्यो लगी है ये भीड ? उन जबाब दिनि, अरे वो नीचे चौक पे साडीयो की दुकान के आगे पता नही कहां से आकर, पांच-छै दिन से एक पागल टाइप की पहाडी बुढिया बैठी हुई थी, जो भी औटो वाला अन्दर गली मे आता था, वह उस पर जो भी उसके हाथ लगता था, फेंककर मारती थी ! अभी-अभी ये बच्चे बता रहे है कि उसे कोई मोटर साइकिल वाला टक्कर मारकर भाग गया ! ’एक पागल टाइप की पहाडी बुढिया’ वीं भाभी का वू शब्द मेरा कानो मा बजण लग्या छैया ! मैन बिना देरि करयां अपणा चप्पल पैरिन और बेड चौक पर पौंछि ग्यु ! भीड का घेरा का भीतर घुसीक मैन जु देखी त मेरा होश गुम ह्वैगैन ! सफ़ेद कुर्सयां बाल, मुख पर बिखर्या छा, भिन्डी दिन बिटीक भुखी-प्यासी, बिना न्हेयां-धुयेयां सडक का किनारा पर बेहोश पडी वा बोडी सचमुच कै पागल जनि ही दिखेण लगी छै ! मैन द्वी तीन लोग, जु मेरा अगनै खडा छा, वू अपना द्वी हाथुन एकितिरफ़ा करीन और बोडी का एकदम पास जैक तै घुन्डो का बल बैठीक अपना हाथ सी बोडी कु चेहरा हिलायि और जोर सी बोली.. बोडी.. बोडी… मगर बोडी पर क्वी सान-बाच नी छै ! मैन इथै-वुथै नजर दौडाइ, कुछ दूरी पर एक पाणी ठेलि वालु खडु छौ, मै दौडी वै मु गयु और एक गिलास पाणिकु लीक वापस बोडी का पास आयूं ! मैन पाणि का छींटा बोडी का मुख पर मारिन, पर क्वी फैदा नी ह्वाइ ! मैन बोडी की नश देखी त नस की धड्कन भी डुबी छाइ, लोग अगल-बगल खडु ह्वैक तमाशु देख्ण पर लग्यां छा ! तभी भीड मा बिटीकि एक दाना-सयाणा आदिमिन बोली ! बुड्डी है,नब्ज से नही चलेगा धड्कन का पता, छाती पे कान लगाकर चेक करो ! मैन उन्नि करि, बोडी की धड्कन च्लण लगि छै !

मैन पास ही खडा एक युवक सी बोली , भाई साहब, वो आगे नुक्कड पर रिक्शा खडा है जरा बुला लावोगे, उसको बोलना कि वालिया नर्सिंग होम तक चलना है ! वू लड्का दौडीक तै रिक्शा बुलेक लाइ, मिन बोडी अप्णा द्वी हाथुन उठाई और रिक्शा मा धारीक तै वै तै फटाफ़ट वालिया नर्सिंग होम चलण बोली ! टैम पर मिल्यां उपचार सी बोडी दुसरा दिन होश मा ऐगी छै ! डाक्टरन एक दिन और बोडी तै ऐडमिट रख्ण की सलाह दिनि ! जब बोडी ढंग सी होश मा ऐगी छाइ, तब मी तै अपण पास देखिकी बोडी का चेहरा पर थोडा रौनक ऐगी छै, जब मैन पूछि कि बोडि कन च अब तबियत ? वीन पूछी, बबा तु वी छै न, जु मी तै गाडि मा मिलि छायो ! मिन जबाब दिनि, हां बोडी मी वी छौ !
बोडी: मेरा बाबा, वै दिन मै तेरि बात माणि याल्दु त…. बोडी रोण लगी छै…. मैन बोडी तै धीरज बन्धै और सम्झै कि अब मै ऐ ग्यु, अब चिन्ता न कर…..!
बोडी: बबा, बिजा निठुर च या दिल्ली त, कै पर जरा भी दया-धर्म नी ! मै छै-सात दिन बिटीकि भूखु-प्यासु रयुं पर कैन एक गिलास पणियो कु भी नि दिनि……. ! बोडी का आखुं मा बिटी आसुं तरपर-तरपर झणण लयां छा !



मिन पूछी, बोडी जौ द्वी लोगु मा मैन गाडि मा बात करि छै, वून क्वी मदद नी करि ?
बोडी: बेटा, वून मी बस अड्डा बीटिकि आटु मा बिठै त यालि छौ पर वै औटु वालन धोखा दिनि बबा, दिल्ली पौंछ्दु-पौछ्दु रात हव्गि छै, वैन मै मु का जथा पैसा छा, लुट्यारु-कुट्यारु छौ, नौना कु पता छौ, उ कमीना सब लीगी बबा और मै तै चौराहा पर धोलिगे, बोडी फिर रोण लगी छै ! अब मेरी समझ मा सारि कहानी ऐगि छै कि किलै बोडी, औटो वालौ पर ढुन्गा फेक्दी छै ! मैन बोडी तै फिर ढाढस बन्धै कि बोडी अब तु बिल्कुल भी चिन्ता न कर, मै छौ त्वै दग्डी मा, मी त्वै घौर तक छोडीक आलु ! बोडीन फिर आंसु टप्कैन, मेरु मुन्ड मलासी और चुप रै, बोली कुछ नी !

शुक्र छौ भग्वानौ कि बोडी पर सिर्फ़ गुम चोट ही लगि छायि , हड्गी-मुड्गी सलामत छै ! नर्सिंग होम बिटीक डिस्चार्ज करीक तै मै बोडी तै अप्णा क्वाटर पर लायु त मकान मालिकुन पूछि, आप इनको जानते हो ? मैन बोली, हाँ, ये मेरी मां है, मुझे ढूढ्ते हुए यहां आई थी मगर मै दिल्ली से बाहर गया हुआ था, इसलिये वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठी ! मेरि बात सुणीक वू लोग हक्का-बक्का ह्वैगी छा ! अब बोडी मेरा पिछ्नै लगी छै बर्ड-बर्ड करण कि बबा मेरा नौना कु अता-पता त अब मै मु छौ नी, पर तु ढून्डी सक्लु वै तै ? मिन बोडी तै सम्झै कि बोडी तू मेरा घर पर आराम सी बैठ, दिल्ली मा बिना पता कु या फिर टेलीफोन नम्बर का ढूढ्ण आसान काम नी, फिर भी मी कोशिश करलु ! वांगा बाद मी एक दिन शाम कु विनोद नगर गयु, कुछ लोग पूछी भी छन कि यख क्वी मनोज नाम कु पहाडी लड़का रंदु ? पर उतना बड़ा विनोदनगर मा यु काम इतनु आसान नी छयो ! बोडी का मेरा कमरा पर औण का द्वी दिन बाद हरिद्वार बिटीकी मेरा बच्चा भी एगी छा ! फिर मिन अप्णि घौरवाली दगडी मा बात करी कि ये शानिबारकू मैं बोडी तै वींगा गौ छोडीक एतवारकू वापस दिल्ली ऐई जालू ! मेरी घरवालीन मी सम्झायु कि यार या बोडी इतनी धारणा धारीक तै, इतना रिस्क लीक तै २६ जनवरी देखण कु आई छाई, त अब दस दिन बाद २६ जनवरी औंण लगी, ये वास्ता कम सी कम बोडी तै अब २६ जनबरी दिखैकी ही वापस भेजला! मैं तै भी अप्णि घरवाली की बात उचित लगी और फिर बोडी तै मनैकी तै, बोडी भी माणि गे !

इंडिया गेट पर छबीस जनबरी देखीकी तै बोडी भौत खुस छै, मानो चार धाम घूमिकी आई गे होली, वखि बीटिकी हम बोड़ी तै लक्ष्मीनारायण मंदिर भी लीगी छा ! वांका बाद मी तै, मेरे घरवाली तै और बच्चा तै वींन कई बार आशीर्वाद दिनी ! फिर एक दिन शनिबार सुबेर, मैं बोडी लीक वींगा गौ निकल पडयु! बोडी का गौ पौछुदु-पौछुदु हम तै रात पडी छाई ! अग्ल्या दिन सुबेर जब मैं वापस दिल्ली औंण कु पैट्यु त बोडी आखों मा आंसू लीक, मेरु थैलू पकडीक डेली पर खड़ी छै ! मैंन बोडी का चरण छुईंन त बोडी मी तै अप्णा सीना सी लगैक फिर रोंण लगी छै ! मिन जाणि- बूझिकी ध्यान बाटंण का वास्ता बोली, बोडी, मेरु झोला इथा गरु किले च लग्णु, आपन क्या भौरी यख पर? बोडी न मेरु मुंड मलासीक बोली, कुछ नी बाबा, मै क्या दी सकदु त्वाई तै ? मैंन बोली, आपकू आशीर्वाद ही हमारा वास्ता काफी च, और फिर मैं निकल पडयु वख बटीक ! बोडी काफी दूर तक भैर छाजा मा बिटीक मी तै जांदू देखणी राइ !

दिल्ली पौन्छिकी जब मेरी घरवालीन मेरु बैग खोली, त मेरा आँखा नम ह्वैगी छा देखीग तै, बोडीन भी उन्नी कुट्यारी बांधीक छै रखी बैग परै, जन कभी दिल्ली औंदी दा, मी तै मेरी माँ देंदी छै बांधीक तै ! डब्बा पर एक माणि घी की, एक कूटयारी पर गौथ, एक्का पर झंग्र्याल और थोडा सा जख्या...................... !




















Monday, April 20, 2009

थोडा मेरि भी सोच

ये कलयुग मा ब्वै-बुबा ही ग्रेट छन त नौनौंगी त बात ही कुछ और च, जब बात हद सी अगनै बढ जान्दि त नौनु अप्ण बुबा तै क्य सलाह देन्दु ल्या सुणा;

पापी ज्यू पर लागि बबा, ज्वानि की खरोच
ब्योगा दिन औण लग्या, थोडा मेरि भी सोच
बानु तु बणौ न बबा, कि खुटटा पर च मोच
उठौ अपणु लाठु छतरु, थोडा मेरि भी सोच

ई भरीं ज्वानि मा भि मी, कब तकै लुकारि ताडु
देखि-देखि की लोगु सणि, कबरी तक टर्कणि गाडु
कैगु क्वी अणबिवायुं रैगि हो, गौंमा इनि क्वि मौ च
उठौ अपणु लाठु छतरु ,अर थोडा मेरि भी सोच

दोण दैजु लीक तै, ये घर मा भी ब्वारि आलि
जन मी पल्येणु छौ, तन स्या भी पल्येइ जालि
मी सी भी छोटा-छोटो कु, अग्ल्या मैना ब्यो च
उठौ अपणु लाठु छतरु अर, थोडा मेरि भी सोच

त्वै सी नि ह्वै सक्दु कुछ त, सुण ली मेरि बात
मैन आफि उठैकि लौण, ज्वी भि लग्लि हाथ
फिर न बोलि नाक कटेगि, दुश्मन सारु गौं च
उठौ अपणु लाठु छतरु अर, थोडा मेरि भी सोच
पापी ज्यु पर लागि बबा, ज्वानि की खरोच
ब्योगा दिन औण लग्या, थोडा मेरि भी सोच

-पी.सी.गोदियाल

Wednesday, April 8, 2009

हे ! तुमुन कबारी क्यैगा आरसा चुरैन ?

जब मैं छौ अपरी उम्र कु भौत नादान
तब रंदु छौ बण्यु गौ कु गबरू पदान
लुकारी खोल्यो मा चडीक, खादरा परै
चोरी-चोरिक खाएं मिन आरसा सदान

कभी येगा, त् कभी वैगा खादरा बीटी
टक रंदी छाई लोगु का ही खादरौ पर
आरसु छौ मेरु एक प्यारु मिठू भोजन
टपैकी ली जन्दुछौ,जब देखि क्वी नी घर

तुम होला सोचणा कि फसक च मारनु
येन भला आरसा कख बीटी खैन ?
लुकारी खोल्यो मा चडी त् गैलु पर
खादरा पर आरसा कख बीटी ऐन ?

गौ मा जब क्वी ब्यो होंदा छा या
ब्वारी आंदी छाई क्वी मैत बिटीक
घौर-घौर मा सबुका पैणु बटेन्दू छौ
जू ब्वारी लांदी छै मैत बिटी लीक

हे!तुमुन कबारी क्यैगा आरसा चुरैन ?
मिन त् यार,बचपन मा भौत खैन
याद आंदी बिजां,याद त् याद ही राण
अब हमुन अरसा त् कख बिटी खाण ?

-godiyal

Sunday, April 5, 2009

लघु गढ़वाली रूपक- 'देशी ब्वारी'

पात्र:
महेशानंद - साठ बर्षीय बुजुर्ग
विशाम्बरी - महेशानंद की पचपन वर्षीय पत्नी
राकेश - महेशानंद और विशाम्बरी का २८ वर्षीय जेष्ट पुत्र
लक्ष्मी - २४ वर्षीय राकेश की बहु ,जेष्ठ पुत्र बधु
अन्य पात्र: दिनेश- २५ वर्षीय द्वितीय पुत्र
दिनेश की बहु-२२ बर्षीय पुत्र बधु
( महेशानंद जी छाजा मा बैठीक हुक्का पेंण लग्या छन और कुछ सोच मा भी पड्या छन, इतना मा भैर चौक मा विशाम्बरी आन्दि)


विशाम्बरी: (ऊँचा स्वर मा कणान्दी और बोल्दी) हे मेरी बोई.... उहू..... मरग्यु मी त..... बजर पडेंन मास्द्वी यी गवाडी मूंदे, सुबेर बिटिकी काम करदू-करदू हड्गा- मुड्गा दुखण लगिन मेरा त ! "काम कु नौ नी च अर् प्राणी कु थौ नी च", पता नी विधातन मेरी यी खोपड़ी मा क्य लेखी, सदानी इनी खैरी खैन मिन त ! कैन सुद्दी थोडी नी खायी उ औखाणु; "हल भी लायी, फल भी पायी, पर सुखदेव जीन कभी सुख नी पायी" !


महेशानंद: हा-हा-हा-ह,... खफ-खफ...हुक्का चिल्म का कस लेते हुए, …किले छे राकेश कि ब्वै आफी-आफ मा बरणाण लगी, तिन बरडै-बरडै कि पागल ह्वै जाण, मिन बोलियाली !




विशाम्बरी: ( गुस्सा मा ) हां-हाँ, होण दया, तुम्तै भारी च फिकर...




महेशानंद: अरे राकेश कि ब्वै, सुण त सै, तुत जरा-जरा सी बात पर गुस्सा ह्वै जांदी...!


विशाम्बरी: बस-बस, आज तक भौत सुणियाली मिन तुमारी, अब नी सुण सक्दू, सुणि सुणिक मेरा कंदूड फुटि गैन !


महेशानंद: (गुस्सा ह्वैक) ओ हो , राकेश कि ब्वै, तुत मेरी बात सुणीक इन उच्हड़न लग जांदी जन कवी चौबाटा पर कालिंक्या उच्हड़दी, पता नि क्य जोग्लौर आन्दि त्वै परै..... पूरी बात कभी नी सुणण !


विशाम्बरी: बोलियाली न, नि सुणि सक्दू , आज तकै मिन सूणी त च, कुछ तुमारी सुणी, कुछ तुमारा लड़ीक,ब्वारिकी ! (गुस्सा दिखौन्दी और बोल्दी) तुमारा आँखा त अभी गरुडून गाडी नि छन, तुम भी देखणागै होला कि क्य च मेरी फंजोडा फंजोड़ी होंणी ! या उमर च अब मेरी काम करनैगी, है ? दिनेशै ब्वारी स्या सुबेर लीक चलिगी छै बौण, घास का बाना परै, अब औली व्यखिनी दा मजा मा हाथ हिलौन्दी, ततुरु दिन काटदी वा तै बौण, अर् स्याम वक्त द्वी पूली घासै मुंड मा धारीक ऐ जांदी मटकी-मटकीग, शरम भी नी औंदी कुत्ति तै ! जै पर बितदी, वै तै ही पता चल्दु !




महेशानंद: ओ हो त क्य करन मिन, किले छै तू मेरा पिछ्नै हाथ ध्वैगी पड़ीं, साफ़ साफ़ किले नि बोल्दी !


विशाम्बरी: क्य करन तुमुन, मजा मा हुक्का प्या और टांगडा पसारिक बैठ्या रा, और कर भी क्य सक्दै तुम ! बिजां फरकैली तुमुन आज तकै....! ( फिर जोर सी बोल्दी ) कम सी कम इथा त होश होंदी कि छोटा नौना कु ब्यो पैली करियालि, अर् बड़ा लड़ीकै गी क्वी पूछ नी...... उ स्यु सुधि च लटगुणु दिल्ली फुंड ! कतना शर्मै की बात च, लोग दू क्य होला बोलणा ! तुम त इन छा सोचणा जन बुले लोग आफी लान्दन आपरी नौनी तै तुमारा मोर पर धार्नौकु तै ! पिछ्नै बीटी सी चार मसाण और ह्वैगिनी खडा, बिवोंण लैख ! कम सी कम ब्योड़ दुकानी मा त जांदा, सी च दूकान छोरो का भरोषा परै छोड्डी, पतानी क्य छन वार-पार करन लग्या वू!




महेशानंद: इन बोल्दु यार त,तेरा बोल्नौगु मतलब या च कि राकेश कु ब्यो करा!


विशाम्बरी: और नतरै सुदी छौ तुम दगडी दिमाग पचिस्सी करणु, एक ब्वारी और यै जाली त थोडा त काम कु बोझ हल्कू होलू , यी छन बुडेन्दी दा मेरा हड्गा-मुडगा चुरेणा, और कुछ नि ह्वै सक्लू वी सी त, कम सी कम खाणौं त देली पकैगि तै !




महेशानंद: हा-हा-हा,..... अच्छा त तू इ छै सोच्णी कि अगर हाकि ब्वारी भी ऐ जाली त सौब काम तब ब्वारी ही करली और तू भी मजा मा टांगडा पसारी बैठ जाली ! कुजाणी बुढडी... कुजाणी-कुजाणी... यांगा भिन्डी सास न रा, आज्कलै पढ़ी-लेखीं नौनी क्वी काम नी कर्दीन, वू त तेरा धन भाग, जू दिनेशै ब्वारी त्वै सणी काम-काजी मिलिग्याई, तू छै सोच्णी सभी तनी ह्वालि ! तू भी रैगी सदानी जंगली गी जंगली...!


विशाम्बरी: हाँ-हाँ मैं त जंगली छौ, तुम त छा मन्खी, भारी घुमायु तुमुन मै बम्बै, कलकता...!


महेशानंद: हे बुडड़ी! झूट न बोली वा, बुडेन्दी दा कीडा पडला, अगर झूट बोलली त...! तता साल घुमाई मिन तू दिल्ली मुन्दै, वू ठीकि बोलि कैन कि 'बार मॉस दिल्ली रै, अर् भाडै झोकी'...!
विशाम्बरी:(गुस्सा मा ऐन्च छजा मा ऐक तै, महेशानन्द का बगल परै बैठीक तै ) बस, तुम मा त व्योगि छ्यो गाडि अर, लग्या तुम मी सैणि लेक्चर सुणोण, कुछ कर्यन-धर्य्न ना !


महेशानन्द: ओ हो, त नी आन्दि बुडीड रस्ता परै, अच्छा त सुण मेरि बात, हमारु नौनु सोलां पढयू च, ये वास्ता, वै तै ब्वारि भि कम सी कम बारह्वीं’ पढीं त खोज्णै पड्ली….


विशाम्बरी: हे मेरी ब्वै, बारां पढी…,तब त करियालि वीन काम काज, भै ज्यादा सी ज्यादा पाच-सात पढी खोजा दू, जरा चिट्ठी-पत्री लेखण-पढ्ण आयि चैन्दी बस, भारि जाण वीन बारां पढीक प्रधान मन्त्री बण्णौ कु त्तै,


महेशानन्द: भै तन्त त्वि जाण, छै-सात पढी दग्डी मा राकेश ब्यो करण तैयार होन्दु भि च कि ना….!


विशाम्बरी: किलै नि कर्लु, मी आफ़ि त सम्झौन्दु वै तै,


महेशानन्द: (परेशान ह्वैक्तै) ओ हो त तु नी छै माण्न्या मेरी बात,चला आज-भोल नौनु भी घौर आण वलु च , वै औन दी, तब वै पूछीक ही ढून्ड्ला नौनि !


( थोडि देर मा नीस खोली कु दरवाजु बज्दु)


महेशानन्द: कुच भै ?


आगन्तुक: मै हू पिताजी, राकेश !


महेशानन्द: (विशाम्बरी तै ) हे बुढडी ! कि छै खुट्टा पसारी बैठी, खडु उठ, नौनु ऐगि दिल्ली बिटिन, चा, पाणि बणौ वै तै..!


राकेश: नमस्ते पिता जी !


महेशानन्द: चिरंजीव बेटा, ठीक छै, औ बैठ, क्य हाल छन दिल्ली फुन्डैगा ?


राकेश: क्या हाल होने है पिताजी, आजकल वहां सडी गर्मी पड रही है बस….उह…..अफ़ ( अपना रुमाल सी चेहरा पर हवा करदु )…. यहा तो फिर भी ठीक-ठाक मौसम है !
(इतना मा विशाम्बरी भितर बिटीक पांण्यों गिलास लान्दि)


राकेश: नमस्ते मांजी !


विशाम्बरी: ( पांण्यों गिलास वै तै पक्डैग तै ) चिरंजीव बेटा ! खुब छै, कथा लम्बि उमर च मेरा बेटै की, आब्बी, हम द्वी बूढ-बुड्या तेरै बारा मा छा बात करना…!


राकेश: मेरे बारे मे क्या बात कर रहे थे मां आप लोग ?


विशाम्बरी: तेरा ब्योगि बात बेटा, तेरा ब्योगि बात छां हम करण लग्यां, बोल दू, पांच-सात पढी नौनि ठीक रालि, भिन्डी पढी-लेखिं लैग भी क्य कर्न, थोडा काम-काज वाली….


राकेश: (बीच मा ही खडु उठ जान्दु और बोल्दु) पांच- सात पढी का मैने अचार डालना है क्या ? पहले तो बी ए हो, नही तो कम से कम इन्टर पास तो होनी ही चाहिये…..(बैग उठैक भितर अपणा कमरा चलि जान्दु)




महेशानन्द: ( विशाम्बरी सी) सुणि यालि तिन, सीधु बी ए च खुजौणु…. ( तोतलु गिचु बणैक ) जाण्दि छै, बी ए कथा तै बोल्दन ? उतनिदा त खुब छै अपरा गिच्चा पर पोलिस लघ्हाणी कि मै आफि सम्झौन्दु अप्णा लडीक तै, अब क्य ह्वै ? वा औखाण च न कि “ मेरु नौनु दोण नी सौकुदु, बीस पथा सौक्याल्दु”… भलो…भलो, तेरै बोल्यां पर मैन कखि बात पक्की नी करि , अभि गला-गला ऐ जान्दि हमारा !


विशाम्बरी: उह ….! करा भै त अब जु कुछ करदै, मिन क्या बोल्ण, पालि-सैन्तीकि, पढै-लिखैकि आखिरि मा इनि लगौन्दन यि जुत्ते पटाक, पाला बल यु तै…!
(अगला दिन सुबेर मु )


महेशानन्द: (विशाम्बरी सी)चल्दु छौ भै मै, जरा मेरु लाठु-छ्तुरु लौ दु बल,
(कुछ देर बाद राकेश भैर आन्दु)


राकेश: मां, पिताजी चले गये, क्या कहा पिताजी ने ?


विशाम्बरी: वून क्य बोल्ण, चलिगिन तब देख दू कखि लग जौ सैदा-भैदा…. आस पास त कखी इथा पढी-लेखि नौनि छौ भी नीन…
(महेशानन्द कु प्रवेश)


महेशानन्द: हे मेरि बोइ, बिजां गरम च होणु आज त, एक गिलास पाणि लौ दु बुढ्दी….


विशाम्बरी: ल्या इच….. जल्दि ऐग्या लौटीक, लगि च कखि…….!


महेशानन्द: हां, तेरै मैत का धोरा च एक नौनि, तेरहा मा पढ्नी च , भैर देश रन्दी, अपणा बै-बुबा दग्डी… आज कल सभि घौर छन आयांका गर्मियो की छुटियों मा ! पर एक बात च भै, चाल-चलण नौनि कु बिल्कुल देश्यों जनु च, काम का नौ परै उल्टु भान्डु सुल्टु नी करदी वा…साफ़ साफ़ बतैलि वींगा बै-बुबन ( राकेश की तरफ़ मुडीक तै ) तेरु क्य बिचार च बेटा ?


राकेश: अगर लड्की वाले तैयार है तो ठीक है पिताजी, मेरे साथ उसको भी दिल्ली के ऐड्वांस कल्चर मे रहना है ! ( भितर चली जान्दु)


विशाम्बरी: (महेशानन्द सी) अच्छा त इन करा कि अगर जल्म्पत्री जुड जान्दि त जब्र्यु नौनु छुट्टि पर यख च और वु लोग भी घौर मु छन, फटा-फट ब्यो भी करि दया


महेशानन्द: ठीक च, मै भी जल्दी निपटौणै गी छौ सोच्णु !


(और तब कुछ टैम का बाद ब्यो भी ह्वै जान्दु, महेशानन्द जी लोण मन्त्र भी जाण्दन, जौं लोगु का गोरु-भैसा ढंग सी दूध नी देन्दन वू महेशानन्द जी मु लोण मन्त्रौण कु आन्दन, ये वास्ता घौर मा लोग-बाग औणा, जाणा रन्दन )


इन्नि एक आगन्तुक: पंडाजी पैलोक !


महेशानन्द: आशिर्वाद महाराज !, आवा बैठा,


आगन्तुक: और सुणा, बाल-बच्चा, कुटुम परिवार सब ठीक ठाक छन, मैन सूणि आपन नौना ब्यो करि हालै मा, नौना ब्वारि कख छन्न ?


महेशानन्द; हां, खडेलिन मास्त, तखि होला भितर फुन्ड जनान्यों दग्डी मा कखी लट्कणा !


आगन्तुक: हे बाबा ! ततरी बात किलै छा बोल्णां, ल्या दु जरा ये लोण तै मन्त्र दयान, बिजां दिन बिटीकि कट-पट च कर्ण लग्यु लम्डौण्यां भैंसु.


(महेशानन्द जी लोण की पूडि क भितर धार्यु एक रुप्या सिक्का कीसा मुन्द धार्दन और लोण मन्त्र्दन)


महेशनन्द: ऒम नमो महादेव साकुर जी तुम को नमस्कारा, धरती माता कुर्म देवता तुम को नमस्कारा, रान्ड को हुन्कार फुन्कार, मर्द को जैकार, ऐला सीता कौन्ति दुर्पदा तुम को नम्स्कारा, (गिच्चा भितर धीरा सी) जो या भैंसी अगर दूध होलि देणी त दूध नि दयान, ब्याण्कु होलि त द्वी थ्वैडा ह्वान ! वांका बाद अपरी मुठ्ठी बौटीक व पर जोर सी फूक मार्दन, और फिर आगन्तुक सी, ल्या ये लोण तै भैंसा तै द्वी दा सुबेर – शाम चटै दयान !
(आगन्तुक का जाण का बाद विशाम्बरी औन्दि)


विशाम्बरी: हे मेरि बै उह ! छी भै, बजर पडेन ये जमाना मुन्दै, बोल्ण कु तै द्वी ब्वारी छन, अर् मेरा यु हाल छन, ऊ भग्यान सी छन मजा मा भितर पड्या का, लोच्डी ऐगि हो जन बुले !


महेशानन्द: (मंद-मंद हंसते हुए) पैली छै बूढ गिताड कि अब नात्ती दु ह्वैगी ! मैन त पैली बोलि यालि छौ कि इना सास कतै न रा कि हाकि ब्वारि का आण पर तु राज माता बणि जालि, अरे बुढ्डी किलै रन्दी त्वै तै इथा सगर-डगर होणी, तु भि चुप बैठ जा दू , हम द्वी झणौ तै पेन्शन ही काफ़ि च, यि मास्द, कर कमै सक्ला त खै लेला, नतरै आफि बजौंदन मुरली !


विशाम्बरी: ऊ भग्यान जब बजौला, तब बजौला मुरली, पर हमारी मुरली त सी आभि बिटीकि बज्ण लैगि, क्य पै मैन युं मास्दु तै पाली-सैन्तीक, सी छ्न बिल्कुल अंग्रेज बण्या, अंग्रेजि मा छन तौन्कि बात चल्णीं, पता नी क्य बुरैं छन हमारि करन लग्या ? ऊ छन सोचणा, यीत बोलिक्तै पढ्या-लिख्या नीन, यून क्य सम्झण की हम क्य छा बोल्णा, पर मै त सौब सम्झ्णु छौ ! ( तबर्यो भितर बीटी राकेश की ब्वारि आवाज लगौन्दि)


लक्ष्मी: मांजी टू कप टी
विशाम्बरी: (महेशानन्द की तरफ़ मुडीक तै) सुणियाली तुमुन क्य च तुमारी देशी ब्वारि मी क तै बोल्णी ?


महेशानन्द: ( अटपटा मन सी)


विशाम्बरी( गुस्सा मा उंची आवाज निकाली तै), हू, जन बुले तुमुन नी सुणी, भै मी तै च बोल्णी कि तू खब्ती छै बल !


महेशानन्द: (हुक्का गुड्गुडाते हुए ) भै, बुढ्डी फुन्ड फूक, अब बोलण दी ऊ तै अब जु कुछ बोल्दन, अब क्य कर सक्दा हम ? जुंओ गा बानौ घाघरू त नी छोड सक्दा न ! आपर्वी सिक्का खोट निकल जौ त क्वी क्य कर सक्दु ?


विशाम्बरी: हां, बोल्ण दया, नतरै मी वीकु गिच्चु छौ बुज्डू, जै बौ गु बल बडु भरोशू छौ, स्ये दिदा-दिदा बोलण लगी ! (ये बीच मा लक्ष्मी दुबारा आवाज लगौन्दी)


लक्ष्मी: मांजी , पिलीज टू कप टी


विशाम्बरी: (गुस्सा मा जोर सी) हे बेटी ! पलीत तेरि ब्वै होलि, जैन तु पैदा करी, अर खब्ती ऊ होला मास्द जौन तु यख विवाइ या यी होल जु इनि भद्रा तै यख लैन !
(लक्ष्मी भैर औन्दि पिछ्नै-पिछ्नै राकेश भी दग्डा मा औन्दु)
लक्ष्मी: (गुस्सा मा) मांजी व्हट नोन्सेन्स,टाक सिन्सीबली


विशाम्बरी: क्या ? क्य बोलि तिन, ह्ट नौनु छैंच, अर तु टांग खैंच देलि, ली जरा खैंची दिखौ, छै अपणा बुबै त ! अर अब पालि-सैन्तिकी ये नौनन त्वै दग्डि मिलिगि तै हमारी टांगै त खिच्ण, हे मास्द, शरम कर !


लक्ष्मी: अरे मांजी, तुम तो मेरी हर बात का उल्टा ही अर्थ निकालती हो, मैने तो आपसे सिर्फ़ दो कप चाय बनाने को ही कहा था, खैर, मै खुद बना लेती हू !
(फिर थोडी देर मा किचन बिटीकि आवाज लगौन्दि, अरे मांजी ! स्टोव जल रहा है , चावल कुक्कर मे डाल दू क्या ? (ये कुक्कर और स्टोव तै वा ब्यो मा दैजा लै छै)


विशाम्बरी: हां, शाबास ! चौलु तै कुकुरु मु डाल दी, और तुम तब थौकुली बजान, भै चौल यू मास्दू तै फीर्यन जु इनि लक्ष्मी यख लैन , ( जोर सी) मैन त बोल्लि छौ, देशि ब्वारि नि ल्हवा… नि ल्हवा……!
(पर्दा गिर जाता है )
_पी.सी. गोदियाल
नोट: यह लघु रूपक मैने ११ मई, १९८२ को किसी खास वजह से लिखा था, तब मैं बारहवी का छात्र था !