Monday, December 21, 2009

ठेस !

आज के अखबारों में यह खबर पढ़कर दिल को ठेस पहुँची ! एक वक्त था, जब मैदानी क्षेत्रो में पहाड़ के लोगो, खासकर गढ़वाली और कुमावनी को नौकरी पर रखने ( चाहे वह घरेलू नौकर की नौकरी हो अथवा दफ्तर के कर्मचारी की) का एक ख़ास मकसद यह होता था कि ये लोग ईमानदार होते है ! लेकिन आज यह भी खबर पढनी थी ! इसका दूसरा पहलू इस तरह भी देखा जा सकता है कि देश की आर्थिक और बेरोजगारी की स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है ! लेकिन सत्ता में बैठे लोग मौज कर रहे है, बेफिक्र होकर !




खबर हिंदुस्तान के सौजन्य से !

Sunday, November 22, 2009

सी बूंद तौं गलोड्यों मा !


त्वै मेरी बांद, मी बतौण ही पड्लु कि
आज इथ्गा उदास किलै च तेरु मन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

मी सी कनी कैकि भी नि छुप्ये सकदीन
तु ढौक जथा भी तौं तै धोति का पल्लन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

यु हैंस्दु बुरांस भी तन किलै मुरझायुं
घाम छैलेगि हो रौली-बौल्यों कु जन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

आज मी तै यख बिटी अडेथ्ण का बाद
कब तक रुऔली तु तौं आंखियों तै तन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

तेरा जाण का बाद, अकेली रालू जब मै
मी तेरी याद का सुपिना आला कन-कन,
यी तरपर ओंस जु मेरी आंखी छन ढोल्णी
दग्ड्या तेरी खुदमा मेरा दिल की बाडुली छन ।

Sunday, November 1, 2009

मिन नी घड्काई आज !

तन किलै रडकाई तिन सी, पीठी मकौ भारू,
मिन नी घड्काई आज, गोरख्याणी कू दारू,
मेरु क्वी नी दोष गैला दोष दग्ड्यों कु सारू,
भलु मन्खी बणिग्यों चुची, अब मी बिचारू,
तेरी कसम, तु जै का मर्जी सौं खिलै ली,
मिन आफु नि पिनी दग्ड्योंन पिलै ली,
कुछ भी नी रैयूं अब मेरा कीसा परै,
तु जथगा मर्जी तै बटुआ हिलै ली,
अब कुछ नि रैगी पैण कु चारू,
तन किलै रड्काई तिन,
स्यू पीठी मकौ
भारू,
चुची,
भलु
मन्खी बणी
ग्यों अब मी बिचारू !
मिन नी घड्काई आज
चुची,गोरख्याणी कू दारू!!

Wednesday, October 7, 2009

भोले पहाडी !

"अरे बेटा, अपना वो गुजरा ज़माना भी क्या ज़माना था, प्रगति की रफ़्तार सब बहा कर ले गई !" अपने उस सुदूर आँचल के किसी वयो-वृद्ध के समीप कुछ पल के लिए फुरसत से बैठो और आत्मीयता से उनकी बातो में लगाव दिखावो, तो समय के थपेडो से खंडहर में तब्दील हो चुके, गुजरे जमाने का वह सैलाब बर्फ की तरह पिघलकर किसी हिमालयी ग्लेशियर से बहकर बाहर निकलने लगता है! गुजरे युग की वो बाते जो आज की पश्चिमी सभ्यतापरस्त पीढी सुने तो, उसको महज एक मजाक दिखे ! लेकिन कल की वो एक हकीकत थी, एक कड़वी हकीकत !

वो वृद्ध आँखे, कुछ याद करने के लिए झुर्रियों की परतो में दबे मस्तिष्क पर जोर डालकर कहना शुरू करती है; बेटा, बहुत भोले-भाले और सीधे लोग थे, उस जमाने में ! जब बासठ की लड़ाई लगी थी, चीन माणा तक घुस आया था, तो उस जमाने में देश में बहुत कम लडाकू हवाई जहाज थे! जब कभी वायुसेना का कोई लडाकू जहाज ऊँचे पहाडो के ऊपर से गुजरता तो लोग सहम जाते, मवेशी विदक जाते थे! स्थानीय लोग कोई बड़ा गरूड पक्षी उस जहाज को समझते और कहते कि
हे गरूड तू इस तरह से "सू" की ध्वनि से मेरे घर के ऊपर से गुजरकर मेरे मवेशियों को डराता है ;

किले जाणु छै गरूड मेरी मरोड़ी का ऐंच सै,
इन न डरो चुचा गरूड, मेरी गौड़ी-भैंस्यु तै !

१९३० के भीषण अकाल के बाद पहाड़ के लोगो की स्थिति भी जर्जर हो गई थी! गरीबी में गुजर बसर करता एक गरीब अपने मन के उदगारों को कुछ इस तरह से व्यक्त करता है कि हे गरीबी, तू कब मेरा साथ छोडेगी;

हे गरीबी, चूची गरीबी, राली कब तकै तू मेरा साथ मा !
एक ऊ भी दिन भी आलू, जब तू आली मेरा हाथ मा !!
ओढूणु नी च, बिछोंणु नी, ठंडन छोरा रोंदन रात मा !
भांडू नी च, कूंडू नी च, खाणु खांदा मालू पात मा !!
गलू भिगोण्नो कु साग नी च, खाई लोण राली भात मा !
लत्ती नी च, कपडी नी च, नौना घुम्दा नांगा गात मा !!
हे गरीबी, चूची गरीबी, राली कब तकै तू मेरा साथ मा !
एक ऊ भी दिन आलू, जब तू भी आली मेरा हाथ मा !!


देश में स्वतंत्रता का दौर आया, ये आजकल के ज्यादातर हराम का खाने वाले नेता तो बस, भ्रष्ट तरीके अपनाकर घर भरने और जल्दी अमीर बनने की गरज में नेतागिरी में उतरते है, लेकिन उस दौर का जो युवा नेतागिरी में उतरने की सोचता था, उसका पहला उदगार जो मुख से निकलता, वह यह होता था कि मैंने भी अपने पिछवाडे पर डंडे खाने की कसम खा ली है, अतः मैं नेतागिरी करने जा रहा हूँ !

बड़ा-बड़ा भारत का नेता ह्वैन,
छोटा-छोटो कु खेल जी,
महात्मा गांधीन सीखी याली
चरखा कातण बेल जी !
जनानियों सीखी याली,
लच्छा जम्बत साडी जी,
मर्दों न भी मूछ मुंडाई,
अर् साफ़ बणाइ दाड़ी जी !
झीला-झाला सुलार झुलेंदा
पूठो मा कोट जी,
होण लगी वख तभी
तौंकी चटा-चट चोट जी !

वहीं दूसरी तरफ देश-रक्षा का जज्बा लिए युवक जब फौज में भरती के लिए आगे बढ़ते तो अपने परिवार से कहते कि ;
धर दे मांजी तू मैंकू रोट
छोड़ दे प्यारी तू मेरु कोट,
कूट दे प्यारी चूडो की घाण
भोल सुबेर जरुरी जाण,
सीखा सिपाहियों तुम बिग्लू कि बोली
भोल तुमारी हाजरी होली,
खावा सिपाहियों तुम काचु प्याज
चलोंण तुमुंन पाणि कू जाज,
नी औंण प्यारी तुमुंन साथ
तुम छा प्यारी जंनानी जात,


बेटा, अपना ये दर्द अब किसे सुनाये, किसी के पास समय ही नही है ? एक लम्बी आह भरकर वह वृद्ध आखो पर छा गई गीली परत को सांफे से साफ़ करने लगे थे !

Monday, October 5, 2009

न हाथीन स्वीली जाण, न बदरू दादन बजार आण !

अपना गढ़वाल की या एक पुराणी कहावत अचानक याद ऐगी, या कहावत भी कुछ वीं कहावत सी मिल्दी-जुल्दी च कि 'न बुबन ब्याण, न भुला होण !' ठीक उन्नी य कहावत भी च कि 'न हाथीन स्वीली जाण, न बदरू दादन बजार आण' !

ईं कहावत का पिछ्नै की कहानी या च कि रुद्रप्रयाग का ठीक पलिपार खड़ी चडाई चढ़न का बाद ऐंच डांडा माँ एक गों पड़दू स्वीली ! ये गौं माँ डिमरी लोग रंदन! बहुत पैली ये गौं माँ एक बदरू दादा रंदा छा ! काफी झाड्फूक और तंत्र-मन्त्र जाणदा छा ! उंगी ख्याति आखिर टीरी का राजा तक पौंछि और राजन वो तै अपणा दरवार माँ पहुंचण कू हुक्म सुणइ, जब अर्दली हुक्म लीग तै स्वीली पहुंची त बदरू दादन राजा तै रैबार भेजी कि जब तक मैं लेण कु हाथी नि आलू मैं दरवार माँ नि ऐ सक्दू ! अब समस्या इ खड़ी ह्वैगी कि आखिर वे खडा डांडा माँ हाथी पौछ्लू कन माँ ? त न कभी स्वीली हाथी गै सकी और न बदरू दादा बजार ऐ !

Sunday, September 13, 2009

गढ्वाली कविता- बिसरीं याद !

दिल मे छुपी एक कसक यहां बयां कर रहा हूं, जिसकी बिडम्बना यह है कि आज की हमारी जो पढी-लिखी पीढी है, जिनके पास इन्टरनेट की सुविधा है, जिसे उनके समक्ष अगर प्रस्तुत करु भी तो वो उस मर्म को समझ नही पायेंगे । और जो उस दर्द को समझ सकते है, वे पढ नही सकते, उनके पास इन्टरनेट नही है ।
ऒंट पे लिये हुए, दिल की बात हम,
जागते रहेंगे और कितनी रात हम,
मुक्तसर सी बात है मुझे अपने गांव से प्यार है …………………..!



याद आन्दा उ पुराणा बचपन का दिन,
फ्योर खाण्कु तै तरसदु यु उल्यारु ज्यु,
पठोडा की दै-छांछ, सिन्द्री कु दूध,
अर कर्कुरु-मर्मुरु भ्योंपाणी कु घ्यु !

थाला-चिलेडी की घस्यारियों का सुरीला गीत,
वूं हरी-भरी मंजरा-मंसारी की धार मा,
कन्दूड तर्सदन फ्योर सुण्णकु तै बैठी की,
गोरु-बाखरा चरौंदी दा, कै धैडा-उढ्यार मा !

दादा कु हुक्का कु गुग्ड्याट, गंडासू कु तम्बाकु,
ठुंगार लगौण्कु रोटि मा, डांडा कु प्याज,
सुपाणा, चौरासू का उ तिल और दाल,
कखै खाण कंडाली कु लड्बुडु काफ़्लु आज !

बस्गालै की रौली-बौली, गाड-गद्रियों मा,
छोटी माछी-गड्यालु का पिछ्नै की झख,
ढुंगी –डल्यों का नीस बिट्नैकी,
कुत्डा-लिग्डा मेट्णैकी टक !

बरखदा दिन पर डिंडाला मा बैठीक,
अगेठी मा मुग्री-भट भुज्णका बाद,
गारी-सगोड्यों मा जगा-जगौं पसरयां,
मार्छा-पिंडालु का चर्चरा पैतूड कु स्वाद !

पुंगड्यों बिटिक चोरीक, काख्डी अर फूट,
अमेड्थ-भुजेला चोर्या, चौडीक कूडा,
स्कूल जांदी दा कीस्यों मा भौरीक,
गुड की गेन्दुडी अर कौणी का चूडा !

कुल्लन खाड खैन्डीक ढूढ्दा छा तैडू,
सगोड्यों का कोणों मा उ ढूढ्णु च्यु,
याद आन्दा उ बचपन का पुराणा दिन,
फ्योर खाण्कु तै तरसदु यु उल्यारु ज्यु !

Wednesday, June 24, 2009

दो पहाडो की आपसी अस्पृश्यता !

बात बहुत छोटी सी है, मगर है बहुत गहरी! यूँ तो सदियों से हमारा पूरा का पूरा भारत बर्ष ही छुआछूत की इस अजीबोगरीब बीमारी जैसे क्षेत्रवाद,जात-पात, ऊँच-नीच, रंग-भेद तथा गरीब-अमीर से गर्षित रहा है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में बसे दो पहाडो, गढ़वाल और कुमाऊ के मध्य की अस्पृश्यता एक भिन्न तरह की बीमारी है !यूँ तो भले ही कहने को ये दोनों पहाड़ एक ही है, और मिलकर उत्तराखंड राज्य बनाते है, किन्तु इनके बीच की दूरियां भी समय-समय पर मानसपटल पर साफ़ परिलक्षित होती रही है हम भले ही, गढ़वाली और कुमाउनी मिलकर एक ही किस्म के पहाडी, उत्तरांचली अथवा उत्तराखंडी होने का राग अलपते रहे, किन्तु सच्चाई यही है कि दोनों पहाड़ कहीं न कहीं एक दूसरे के प्रति एक अलग किस्म का भाव अपने दिल में पाले है !


आवादी और क्षेत्रफल के हिसाब से गढ़वाल क्षेत्र, कुमाऊ क्षेत्र के मुकाबले काफी बड़ा है, और जब उत्तराखंड राज्य की मांग उठी, इसी मुद्दे पर बहुत दिनों तक यह गहमा-गहमी और मतभेद बना रहा कि प्रस्तावित राज्य की राजधानी गढ़वाल में हो अथवा कुमाऊ में ! अभी हाल का मुद्दा रहे श्री भगत सिंह कोश्यारी और उनके चंद कुमाउनी विधायक मित्र, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जनरल खंडूरी को हटाने में कोई कसर नहीं छोडी और साथ ही कोश्यारी जी को जब अपने पक्ष में हवा बनती नहीं दिखी तो अपने एक सहयोगी श्री प्रकाश पन्त को इस आधार पर आगे किया कि पहले मुख्यमंत्री गढ़वाल का था, अब कुमाऊ का बनना चाहिए, लेकिन अफ़सोस कि उन्हें भाजपा के ३५ विधायको में से सिर्फ कुछ का ही समर्थन प्राप्त हुआ !

राजनीति में अवसरवादिता और उसका फायदा उठाना रणनीति का एक हिस्सा हो सकती है लेकिन इस आधार पर अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए गढ़वाल और कुमाऊ के नाम पर दो पहाडो के मद्य खाई खड़ी कर देना, मैं समझता हूँ एक निंदनीय कदम है ! और प्रत्येक उत्तरांचली को, चाहे वह कुमाऊ का हो अथवा गढ़वाल का, इसे समझना होगा और इस संकीर्ण दृष्टीकोण से बाहर निकलना होगा, तभी पूरे क्षेत्र का समग्र विकास संभव है!