Thursday, January 17, 2013

देख्दा-देख्दी सब्बी हर्ची !


पराग दूध की थैली आई, 
कल्च्वाणी कू तौलु हर्ची। 
गौं माँ पर्चूनै दूकान आई, 
पुङ्गुडियों मा सौलु हर्ची। 
मण्डी  देशी भुज्जी आई, 
सगोडियों मा गौलु हर्ची।  
बिलैती लत्ती-कपडी आई, 
पोटगी तौल़ा  नौलु  हर्ची। 
हर हफ्ता कू बाजारआई   
गौं मा मेलु - थौलु हर्ची।  
सौण-भादों कु मैनु आई,     
बस्गाली रौलु-बौलु हर्ची।   

Tuesday, January 15, 2013

ढाढ़स

















पलॆखी जाली सी आंखि जब दिन जग्वाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना 
भाना लम्पु बाळी की। 

छुट्टी  शैद  मी भी आलु  ऐंस्वी बग्वाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना 
भाना लम्पु बाळी की।

खुट्यों मा पराज लग्ला,खुटी मा तु 
खुटी धारी,
गौळा लगली बाडुळी जब,पाणी का घूट मारी।

ब्याखिनीदां भभ्रालि आग चुल्ला मुछ्याळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना छोरी लम्पु बाळी की।

खिलला ग्वीर्याळ-बुरांश तौ डांडी-कांठियों मा,
छुक-छुक कै दौड्ली हिलांश बौण-बाट्यों मा।

घुघूती बासली मुंडल्यों बैठी छाजा-धुर्पाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना भाना लम्पु बाळी की।

लेकि तै झंगोरू-साट्टी परात अर भदाळी मा,
कट्ठा ह्वेकि तै बेटी-ब्वारी गौंकी उर्ख्याळी मा।

जब सुप्पाले का गीत ग़ाली गांज-गंज्याळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना भाना लम्पु बाळी की।

चौंऴ, झंगोरू राळीक  खैली  भुजि कंडाळी मा,

भट-बुखणा टुप कै बुखाली तिबारी-डिंडाळी मा।

गौ बीटी आली साज ढोल-दमौ,डौंर-थाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना प्यारी लम्पु बाळी की।



Monday, January 14, 2013

दुतर्फ़ी


ह्युन्द की चसी रात, 
कूडै गी बग्ली, 
चुल्ला का कोणा पर,
आटु गुन्ददी 
हिलांदी छाति,    
मी सणी याद करदु, 
जब भी तेरी जिकुड़ी घबराली। 
यख जन्नि मी तै बाडुली लगी अर,
वख तेरा चुल्ला आग भभराली।।  

सुब्की-सुब्कीक तु मी 
देंदी रै गाली,
पर भभ्रान्दि मुछयाली मुंद 
तु पाणि न डाली। 
खुटी पराज न लगै तु यकुलि खुदेकी,   
चुचि, दिल न सुखै तू बाडुली बुथेकी,
अंधेरी कोण्यो बिछोणा बैठीक
काकर, संगाड जन्नि तू टपराली।  
यख तन्नि मी तै बाडुली लगी अर,
वख तेरा चुल्ला आग भभराली।।   

Saturday, August 25, 2012

कांडा !


माया, धन-दौलत, सोहरत
घौर, जनानी, बाल-बच्चा 
क्य नि छौ,   
सब्भी धाणी छौ आफु मू !
पर उ दाना-सयाणोंन ठीकी बोली
कि जब ख़जेणा दिन औंदन त 
मवासी पर कांडा लग जान्दन !


एकी दगडी जब एगी धीत नी भरे,
पचास -पचास  रखिन नौकरी परैं !
और-त-और जनानी की भी नी धरे, 
इना कांडा लगींन एगी मवासी परैं !!

Saturday, August 18, 2012

बिरहणी कु मर्म !









लौकिं कुयेड़ी, 
बस्गाऴी बौछार,
ज्वानि का दिन चार, 
बाट्टू हेरी-हेरीक 
पळेखिगिन आँखी,
कब आलू तू 
द्वी मैनै की छुट्टी  
हे मेरा सिपै-सलार !  
निरभैगी, 
बतौ तू ज़रा 
इनु क्वी दिन-बार,
नि आन्दु हो जै दिन
मेरी जिकुड़ी मा,
तेरी याद,  त्व़े पर प्यार,
क्य बुध-भिप्प्यार,
क्य  छंचर-इतवार !!    



और अब हिन्दी सार :  बिरहन  अपने सैनिक पति को पत्र लिखकर कह रही है कि 
पहाड़ों में बरसात का मौसम चरम पर है,ऊपर से  ये जवानी चार दिन की है, तम्हारी  
राह तकते-तकते आँखे थक गई , दो महीने की  छुट्टी कब आ रहे हो !

हे निष्ठुर ! कोई ऐसा दिन-वार बताओ, क्या बुध-बृहस्पतिवार, क्या शनिवार- रविवार,  
जब तुम्हारी  याद और तुम पर मुझे  प्यार न आता हो !   

Monday, July 23, 2012

टकों का बाना..... !


भिंडी मेटणैं की दोंन,  अर कम मेट्यॉ कू सोग, 
टकों का बाना आज संग्ती, बौऴेण ल्ग्याँ लोग ! टकों का बाना..... !!  

लेणँकू रै न क्वी ईमान, देणकू तै खतीं जुबान,
लेंदी दां का सौ लारा-दारा, देंदी  दां कु टप बोग !   टकों का बाना..... !!  

छुंयों-छुंयोंमा देंदा टरकै, थूकमा यूंन पकोड़ी पकै,
लाँणकू नी थेक्ऴी गात, ख़ाणकू चैंदु विलैती भोग !  टकों का बाना..... !! 


चोर बणिगैन धन्ना सेठ, काटि-काटीक लुकारू पेट, 
धीत नी भरेंदी यूंकि, ऑर ख़ाणें रैंदी सदानी मोंग !    टकों का बाना..... !!    
    
अति दुसरै की दां  नि सम्झी. माँ यूंन माँ नि सम्झी,      
देवतों का ये मुल्क परै, नासूर बणीगे अब यू  रोग !  टकों का बाना..... !!



तथ्गा ना तुम बक्सा भरा, न भिंडी हबड़-दबड़ करा,   
वैन उथ्गा ही ख़ाण भुलों,  रैलू  जैकु जथ्गा  जोग !  टकों का बाना..... !!




  हिन्दी सार: अधिक पाने की लालसा और कम पाने का गम, पैसे के खातिर लोग पागल हो  गए है ! किसी से जब उधार लेना हो तो कोई ईमान नहीं ,  किसी को देने को कोई पक्की जुबान नहीं, जब खुद किसी से लेना हो तो मीठी-मीठी बाते और जब लौटाने की बात करो तो  फोन तक न उठाना ! सारे चोर-डाकू आज बड़े धन्ना सेठ बने बैठे है ! पेट नहीं भरता इनका , पैसे के खातिर ये माँ   को माँ नहीं समझते  ! लेकिन दोस्तों ! ये  भूल रहे है कि हरएक का जाना निश्चित है, एक लिमिट से ज्यादा बटोरकर भी क्या कऱेगे ?  
    

Saturday, July 7, 2012

वक्त की मार !

ऴोऴी या पिठैं भी क्य होंदी द्वारी दाथ्डै की धार,
कळ्यौ की कंडी मुदै, पैणैंकि कुट्यारी मा प्यार, 
कभी छूं औण परैं जैका नौकी वा खांदी छै खार,
बौंण-पंदेरौं वै गी भुली तैं अब स्ये पुछणी रैंन्दी,      
हेली, तेरा भैजी, क्वी चिट्ठी-पत्री,क्वी रंत-रैबार !! 

हिन्दी सार : सगाई, जिसे गढ़वाली में पिठैं कहते है, भी क्या मुई चीज होती है जो मिठाई की टोकरी के अन्दर मिठाई संग प्यार लेकर जाती है ! एक वक्त था जब वह उसका नाम तक सुनना नहीं चाहती थी और अब, जंगल- पनिहार जहां भी उसकी छोटी बहन उसे मिलती है तुरंत पूछती है, हे ! आजकल तेरे भाई की कोई चिट्ठी या सन्देश आया ?