Monday, January 28, 2013
Saturday, January 26, 2013
बिमाल !
अब रूम्क पड्न लगीं,
गग्डादू सर्ग, गग्डादू सर्ग= गरजता आसमान (thunder sky)
अर भैर बथों-बत्वाणी,
न जा सुवा इना मा,
रात यखि रुकजा आज ,
अडेथ्लु त्वे भोळ रत्वाणी। अडेथ्लु=छोड़ के आना (to drop)
लौ-लत्ती,सैन्त्यु-सम्हाल्यु
घौर मेरा तंत
सब्बी धाणी च,
पर मैं भी खै लेलु दूँ
चुची आज तेरी तों
गोंदगि सी हाथ्योंग़ी बणई ,
रोटी-गथ्वाणी।।
रत्वाणी / रतब्याणी = भोर पर (Early morning)
सार: प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा है कि सांझ ढलने लगी है, आसमान गरज रहा है, आंधी-तूफ़ान भी है ऐसे में आज यहीं रुक जा , तडके तुझे तेरे घर छोड़ दूंगा, आज तेरे इन कोमल हाथों की बनी रोटी और गथ का साग मैं भी खा लूंगा।
Thursday, January 24, 2013
कुछ गढ़वाली मुक्त छंद
सेन्दु - जाग्दु
वक्त -बेवक्त
आंख्यों मा
रिंग्दी रांद,
रात जन्नी
बिछोंणा पौड्यू
सुपिना आंदि
उलार्या बांद।
भरीं ज्वानि,
इखुलू मन
सब्बी अपणा
सी दूरु-दुरू ,
दंदोल उठ्दी,
प्राण ड़ब्कुदु ,
जिकुड़ी झुरान्दी
अर बाडुली शुरू।
xxxxxxxx
द्वी दग्ड्याणी
छ्वीं लगाणी
खड़ी ह्वैकी
वळ्ळि मोरी,
पल्ली मोरी,
छ्वीं लगाणी
खड़ी ह्वैकी
वळ्ळि मोरी,
पल्ली मोरी,
दुत्ति, पातर
क्वा च बल वा ?
अरे वी,
वा लबरा छोरी।
अरे वी,
वा लबरा छोरी।
सूणिकीतै लुळयाट
तौन पूछी,
किलै रव़े वा
तौन पूछी,
किलै रव़े वा
बुकरा-बुकरी ?
मीन बोळी,
मेरु लाड़,
मेरु पुळयाट।
मीन बोळी,
मेरु लाड़,
मेरु पुळयाट।
xxxxxxx
इन भरमौन्दि
ह्युंदा दिनू ,
घुंघुरू घाम
लग जाँदा,
सासु का
जब ठण्ड मा,
इन भरमौन्दि
ब्वारी बौगी ह्वेक़
जन मुण्डौ नौ
बल कपाल,
कख च ?
बर्मंड मा।
Wednesday, January 23, 2013
एक गढ़वाली गजल:-अपणा तौं कुकुरू तै माई, तु देंदी रा गफ़ा !
जब तकै सी कुकुर त्वे दगड़ी दिखौणा वफ़ा,
अपणा तौं कुकुरू तै माई, तु देंदी रा गफ़ा।
इना कुकुर बिलैत त क्या त्व़े कखिनि मिलों,
कुछ भी न्ही नुकशान यख मा,बस नफ़ै-नफ़ा।
भौं-भौं कैकि लोगु परैं जब तकैं ई भुकणा छन,
ये देशै की रुप्यों की कुट्यारी तू करली सफ़ा।
मुंड निखोलु करीक भी यी अब कखी न जौं,
त्वेन फुंड धोल्याँ कुकुरू परैं इन लगैली ठपा।
भैर परदेश का चोरू तै देखीक पूछ हिलौंदा,
गौ-गला का लोगु परैं झपटदा सी हर दफ़ा।
इना लंडेरु कुकुरू सी तु कभी ह्व़े ना खफ़ा,
सि तौं लंडेरु कुकुरू तै माई, तु देंदी रा गफ़ा।
अपणा तौं कुकुरू तै माई, तु देंदी रा गफ़ा।
इना कुकुर बिलैत त क्या त्व़े कखिनि मिलों,
कुछ भी न्ही नुकशान यख मा,बस नफ़ै-नफ़ा।
भौं-भौं कैकि लोगु परैं जब तकैं ई भुकणा छन,
ये देशै की रुप्यों की कुट्यारी तू करली सफ़ा।
मुंड निखोलु करीक भी यी अब कखी न जौं,
त्वेन फुंड धोल्याँ कुकुरू परैं इन लगैली ठपा।
भैर परदेश का चोरू तै देखीक पूछ हिलौंदा,
गौ-गला का लोगु परैं झपटदा सी हर दफ़ा।
इना लंडेरु कुकुरू सी तु कभी ह्व़े ना खफ़ा,
सि तौं लंडेरु कुकुरू तै माई, तु देंदी रा गफ़ा।
Tuesday, January 22, 2013
गढ़वाली गीत -छुट्टी ऐगी,फौजी भैजी ठम !
पल्टन बिटीक छुट्टी ऐगी फौजी भैजी ठम,
अब नि रैगी हमतै भुलों, द्वी मैना क्वी गम।
क्वी प्यावा बरांडी-विस्की, क्वी प्यावा रम,
अब नि रैगी हमतै भुलों, द्वी मैना क्वी गम।.......;2
हे भुली, हे बौजी तुम,तन न सुजा मुखड़ा तै,
करकरा अंगारू मा ए,झट भड्या तै कुख्डा तै।
भिंडी सब्र, इन्तजार अब नि कै सकदा हम,
अब नि रैगी हमतै भुलों, द्वी मैना क्वी गम। ;.......;2
हे छोरों तुम तौं पकोड़ों तौळन द्यावा मी मा,
गौत्थ्वी भरी रोटी फौजी भै खिलावा घी मा।
कैतैं बड़ा-बड़ा बणावा पैग, कैमू ड़ाळा कम,
अब नि रैगी हमतै भुलों, द्वी मैना क्वी गम।;.......;2
एक बोतल खाली ह्वैगित,हैक्कि खोला धम,
और डाळा ये गिलास मा,तननि डाळा कम।
झम-झमाट इन पड़जौ जू पोट्गी परैं झम,
अब नि रैगी हमतै भुलों, द्वी मैना क्वी गम ;.....;2
Thursday, January 17, 2013
देख्दा-देख्दी सब्बी हर्ची !
पराग दूध की थैली आई,
कल्च्वाणी कू तौलु हर्ची।
गौं माँ पर्चूनै दूकान आई,
पुङ्गुडियों मा सौलु हर्ची।
मण्डी देशी भुज्जी आई,
सगोडियों मा गौलु हर्ची।
बिलैती लत्ती-कपडी आई,
पोटगी तौल़ा नौलु हर्ची।
हर हफ्ता कू बाजारआई
गौं मा मेलु - थौलु हर्ची।
सौण-भादों कु मैनु आई,
बस्गाली रौलु-बौलु हर्ची।
Tuesday, January 15, 2013
ढाढ़स
पलॆखी जाली सी आंखि जब दिन जग्वाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना भाना लम्पु बाळी की।
छुट्टी शैद मी भी आलु ऐंस्वी बग्वाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना भाना लम्पु बाळी की।
खुट्यों मा पराज लग्ला,खुटी मा तु खुटी धारी,
गौळा लगली बाडुळी जब,पाणी का घूट मारी।
ब्याखिनीदां भभ्रालि आग चुल्ला मुछ्याळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना छोरी लम्पु बाळी की।
खिलला ग्वीर्याळ-बुरांश तौ डांडी-कांठियों मा,
छुक-छुक कै दौड्ली हिलांश बौण-बाट्यों मा।
घुघूती बासली मुंडल्यों बैठी छाजा-धुर्पाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना भाना लम्पु बाळी की।
लेकि तै झंगोरू-साट्टी परात अर भदाळी मा,
कट्ठा ह्वेकि तै बेटी-ब्वारी गौंकी उर्ख्याळी मा।
जब सुप्पाले का गीत ग़ाली गांज-गंज्याळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना भाना लम्पु बाळी की।
चौंऴ, झंगोरू राळीक खैली भुजि कंडाळी मा,
भट-बुखणा टुप कै बुखाली तिबारी-डिंडाळी मा।
गौ बीटी आली साज ढोल-दमौ,डौंर-थाळी की,
अँधेरी कोंण्यों रव़ेई ना प्यारी लम्पु बाळी की।
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