Monday, September 26, 2022

पहाड़ू की पनचक्की(घट)...







डीजल-बिजली की चक्की खैगे ,

ग्यौं-जौ पिसायांकु भग्वाड सारू,

'रौली' नीस पाणिं मा नाचदि रै,

अर ऐंच, खौल्यूं रैगी घट बिचारू।


अचाणंचक बतेरा बेबस बणिगैन  

दुर्गति की ईं कलजुगी दौड़ मा,

मुण्ड रेची कैन श्रीनगरै स्वसैटी मा,

त कैन,डेली-मोड्ल्ला क्ल्यासौड़ मा।


दौंण लीकी क्वी नि आई, ईबारी

ग्यौं-जौ पिसौणौं कु गाड-धारू,

'रौली' नीस पाणी मा नाचडिकी रै,

अर, ऐंच खौल्यूं रैगी घट बिचारू।

Saturday, August 18, 2018

एक गढ़वाली कविता- चुष्णा वन्दना

एक गढ़वाली कविता- चुष्णा वन्दना 

या कविता मेरी सारि चुष्णा पर 
ध्यान लगावा  बिंग्यणा मा ,
सुण्ण तुमुन त टक लगै  की
नी सुण्दै त चुष्णा मा।  

बडो फ़रक च ये चुष्णा कू 
भेद समझण  सुण्ण मा ,
कना कनौ  की  मौ चलिगेन 
चूषणे, चूषणम, चुष्णा मा।

चुष्णा आन्दू काम हमारा 
जाण तलक सी होंण सी,
कोर्ट, कचहरी,दफ्तर जथगा
मुहर च लगदी चुष्णै की।

गुरु द्रोण भी जाण्दा छाया 
विकट शक्ति तै चुष्णा की,
एकलव्य सी गुरु भेंट मा
मांगी तौन चुष्णा ही।

पहाड़ियोंन अप्णु  राज्य बणै  छौ
लग्यां रंदन अब कोष्ण मा,
चुष्णा दिखाई  नेता लोगून
बड़ा बड़ा सुपिना दिखैकि घोषणा मा।

बाबू लोग भी दिनरात लग्यां छन
एका -हाका तै  लुछंण मा ,   
सुण्ण तुमुन त टक लगै  की
नी सुण्दै त चुष्णा मा।  

अब त नै-नाना भी याद ऐगेन
राजधानी गैरसैण तक लोष्ण मा,  
मंत्री दिदा सब्बी व्यस्त हुइयाँ छन  
दिल्लिया  देवी-देवतौं तै तुष्ण मा। 

मिन चुष्णै कविता लेखि पुन्ग्डा मा 
रैग्यूं कलम घुष्णा  मा,
आई बरखा रुझिगे कागज़ 
कविता चलिगे चुष्णा मा।
-द्वारा संशोधित, पीसी गोदियाल 'परचेत'       


     

Thursday, December 28, 2017

गैरसैंण पर नेता जी की सफै !

एक छोटिसी उत्तराखंडी  कविता :          
गैरसैंण पर नेता जी की सफै !

हाँ, हमतै दून बिटिकी लगाव छ,
परन्तु पाड़ों से थोड़े हमतै "वैर" ठैरा,
अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।

अरे ग्याड़ों, तुम क्य जाणदै, हम जाणदां .......
गुजारु नी च हमारु वांका "वगैर" ठैरा,
चुनौ लड़णों क त हमन वक्खी जाण, 
जु नि जाला वख त हमरी "खैर" ठैरा।    


अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।

भितरा-भीतरी त हम भी बगोळ्या छां,
पर बथै  नि सक्दां  "भैर" ठैरा ,
पांच साल त खैंचि  ही द्याळा 
पर वांका बाद क्य ह्वालु, यू "डैर" ठैरा।
अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।

बल वा पिकनिक, सपाटै की जगा च,
ये वास्ता हर साल जांदां करनौ "सैर" ठैरा,
फिर भी वख जाणै की कुछ मन्ख्योंकि 
पतानि किलै गाडिच या "ळैर" ठैरा।     
अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।
     -पी सी गोदियाल 'परचेत'  
  


Sunday, August 9, 2015

एक.खुली चिट्ठी उड्यार जी के नाम !


दिनांक: ०१/०८/२०१५

आदरणीय उड्यार जी,
सादर चरण स्पर्श🙏 सर्वप्रथम आत्मरक्षा बाद को अन्य कार्य हैं।
मैं यहाँ पर सपरिवार कुशल से हूँ और आशा करता हूँ कि आप भी वहाँ पर हीसर, किन्गोड़ और तुंग के बोटळौ तथा बांज और चीड़ के दरख्तों के बीच कुशल-मंगल होंगे।

मेरे गांव के बुजुर्ग उड्यार जी, जबसे उत्तराखंड से लौटा हूँ,बस एक अजीब सी आत्मग्लानि मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है। और उसी का नतीजा है कि मैं यह खुला पत्र आपको सम्बोधित कर लिख रहा हूँ ।यह जानते हुए कि आप न सिर्फ सहृदय और परोपकारी है अपितु क्षमाशील भी है, और अगर कहीं भी मैं गलत हूंगा तो आप मुझे अवश्य ही माफ़ कर दोगे।
आत्मीय उड्यार जी, आप बहुत बुजुर्ग है और इस बात को शायद मेरे से भी ज्यादा भली भाँती समझते होंगे कि अपना देश, गांव-मुल्क अपना ही होता है। और खासकर वह मुल्क, जहां हम अपना अधिकाँश बचपन का समय अपने प्रियजनों और बाल सखाओं/सखियों के साथ व्यतीत कर चुके हों, शायद जान से भी ज्यादा प्यारा होता है। इंसान भले ही जिंदगी के लक्षित तमाम मुकाम क्यों न हासिल कर ले, किन्तु अपने परिवार, प्रियजनों की ही भांति देर-सबेर उस गांव-मुल्क की याद उसे वक्त-बेवक्त विचलित कर बैठती है, जो कभी उसका बचपन जीने का आधार था, और जब फुर्सत मिले, वह उससे मिलने के बहाने ढूढ़ने लगता है।

ऐसा ही कुछ, गत माह मैं भी उत्तराखंड स्थित अपने गाँव नौगाड से मिलने गया था। रात को श्रीनगर रुका और सुबह जब अपने गाँव के लिए निकला तो करीब १० , १०:३0 बजे पहाड़ पर मौसम ने अचानक करवट ली और तेज बारिश शुरू हो गई। अपने गाँव और आपके समीप ही था कि गाडी का टायर पंक्चर हो गया। गुस्से में उस वक्त तो उसे अपना दुर्भाग्य समझ किस्मत को बहुत कोस रहा था और अपना माथा पीट रहा था, परन्तु शीघ्र ही मैं उसे अपना सौभाग्य समझने लगा कि इसी बहाने मुझे बहुत साल बाद आपके दर्शन हो गए थे। अकेला होता तो शायद गाडी में ही बैठकर बारिश के बंद होने का इन्तजार करता, किन्तु बच्चे साथ में होने और भूस्खलन के खतरे की वजह से दिमाग पर विकल्प चुनने का जोर बढ़ने लगा था। गाडी के शीशो पर बारिश की वजह से बहुत आदर्ता होने की वजह से बाहर दृश्य:शून्यता थी किंतु दीमागी उलझन की बजह से मैं उस तेज बारिश में ही गाड़ी से बाहर आकर इधर-उधर नजर दौड़ाने लगा था। और तभी मुझे आप नजर आ गए।

आपको भी शायद याद हो या न हो कि मैंने 'आव देखा न ताव' और बच्चो को तुरंत गाडी छोड़ने को कहा और हम सभी उस तेज मूसलाधार बारिश से बचने के लिए आपकी तरफ भागे चले आये थे। आपकी चौखट पर पहुँचने से पहले मेरी धर्मपत्नी का पैर फिसला था और आपने अपनी वयोवृद्ध सदी हुई मधुर आवाज में कहा था , "अंक्वैकी, मेसी परै बेटा" (संभलकर, आराम से, बेटा ) ! आपकी शरण में कुछ पल ठहरने के बाद हालांकि हम लोग गंतव्य को निकल चले थे किन्तु मैं यह कैसे भूल सकता था कि यह वही पवित्र स्थान मेरे लिए अपने घर से ज्यादा चिर परिचित था। वो बात और थी कि सभ्यता और बदलाव की आंधी में चूर, मैं भी आपके समक्ष यह दिखाने का नाटक कर रहा था कि मैं तो तड़क-भड़क में रहने वाला एक शहरी बाबू हूँ।

नि:संदेह, आप मुझे इतने सालों बाद कैसे पहचानते ? किन्तु, वो मेरी मूर्खता और स्वार्थ था कि मैंने जान-बूझकर अपना परिचय आपको नहीं दिया। क्योंकि एक डर मुझे अंदर से खाए जा रहा था कि कहीं हमारे ये पहाड़ी बुड्या जी, मेरी बचपन की पोल मेरे परिवार, मेरे बच्चो के सामने न खोल दें। अंग्रेजी में एक कहावत है " ओल्ड हैबिट्स डाई हार्ड" अर्थात पुरानी आदतें आसानी से नहीं जाती और वो मेरे से भी जुदा नहीं हो पाई। गलतियां और बेवकूफियां करने के बाद जो डर बचपन में लगा रहता था, वो आज भी मेरे अंदर मौजूद है।

कैसे भूल सकता हूँ कि बचपन में जंगल में गाय, बकरियों को चुंगाते वक्त जब कभी अचानक बारिश आ जाती या फिर तेज धूप पड़ रही होती तो मैं अपने बाल-सखाओं संग तुरंत आपकी शरण में आ जाता था। और तो और, जिस दिन स्कूल जाने का मूढ़ नही होता था, पूरी मंडली छुपने (लूक्णौ तै, जिसको यहां शहर के सभ्य लोगो की भाषा में 'बँक मारना' कहते है ) के लिए आपकी शरण में ही आते थे। मुझे याद है, नटखट दोस्तों संग हम कच्चे केले का पूरा फिर्क (डांठ ) गांववालों के बगीचों से चुराकर आप ही के आँगन में गड्डा खोदकर पकाने हेतु रख देते थे, उसके ऊपर चीढ के पिरूल (पिल्टू) को जलाकर और फिर छुटटी के दिन पूरी मंडली गाय, बकरिया चुगाने के बहाने आकर, ठाठ से आपकी छत्र-छाया मे बैठ, पके केलों का आनंद लेती थी।

आदरणीय उड्यार जी, आपको शायद यह भी याद होगा कि बचपन के अगले चरण और चढ़ती जवानी के शुरूआती दिनों में मैंने अपनी अपरिपक्वता की मिशाल आपके समक्ष पेश कर अपना पहला प्यार ढूढ़ने की पहली असफल कोशिश भी आप ही की छत्र-छाया में की थी, हालांकि वह परवान नहीं चढ़ पाया था। अपने पैरों पर खड़े होने के अरमान लिए जब मैं पहली बार गाँव से निकला था तो 'दोपहर के गेट' ( दोपहर की बस) की खिड़की से नम  पलकों से मैंने अपने गाँव, खलियान   और जंगल के साथ-साथ आपको भी निहारा था। पिछले महीने आपसे अचानक हुए मिलन और आपको खुद का परिचय न देने की बेवकूफी पर मुझे अपने ऊपर इतना क्रोध आया और आत्मग्लानि हुई कि मैं अपनी आत्मा को कई रोज तक बार-बार धिक्कारने से नहीं चूका।

मुझे आप पर भी गुस्सा आ रहा था कि जिसतरह उस समय जब मैं अविवाहित  था और शहर से बहुत समय तक अपने गाँव छुट्टी लेकर नहीं जाता था तो मेरी दादी तुरंत मुझे पत्र लिखकर पूछती थी कि ;
सूट-बूटु की चमचम 
अर लैण-खाण का भौर,
भिन्डी साल ह्वैग्या त्वे
परदेश गयां छोरा,
कब आलू चुचा घौर।

सुद्दी-मुद्दी की श्याणी ,
ना खै-कमैकी जाणी,
दुनिया की देखा-देखी
अर पड़ोस्यों की सौर ,…… 
भिन्डी साल ह्वैग्या त्वे 
परदेश गयां छोरा, 
कब आलु चुचा घौर...।।

और मैं जब मौका मिलता छुट्टी लेकर  गाँव का रुख कर लेता था। मुझे क्रोध आपपर इस बात का भी आया कि भले ही मैंने आपको भुला दिया हो किन्तु आपने क्यों नहीं कभी मुझे कोई खत लिखा ? खैर, मैं आशा करता हूँ कि आप मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे। आप अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना , पहाड़ों में आजकल बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बहुत बढ़ गई है, अत: आप  अपनी संजीदगी से रहना । अबके जब  गाँव आऊंगा तो आपके दर्शनार्थ अवश्य आऊंगा।  इसी वादे के साथ, 

आपके अहसानो तले दबा
आपका अपना ही
-एक अहसान फरामोश पहाड़ी !
आपका प्रकाश।

Saturday, December 13, 2014

पहाड़ी शेर


गढ़वाली कविता : - पहाड़ी शेर !
घरवाळी का अग्नै 
जू ह्वै जौ ढेर, 
वु पहाड़ी शेर।  


बाघ बुल्दन लोग 
तख  भी  वै तैं,

कुछ डब्राण्या-कब्रांण्या,
कुछ चौंर्या बाघ........
घरवाळी 
गुगरांदी जब 

त गिचा बिटिकी तैका 
निकुल्दु झाग.....
गिचु पोंछींकी 
मैदान मा ऐकी तै   
जू डट जौ फेर,
वु पहाड़ी शेर।  



 तैतैं खैंडणौ कु 
बिजां शौक़ च,
       तैडू,पिंडाळु कुछ भी ......  
जब कुछ न मिळु त
          पड़ोस्योकि ही खैंडण लग्दु …....  
न्त काळु सी रैंदु बण्यू  
पर टिंचरी का द्वी पैग 
पेट उन्द गै नी कि  
झट्ट भगवतगीता कु 
पाठ सुणौंण लग्दु .......
पी-पीकी बोंज पिचक्यां  रैंदा 
पर भकांई रैंदी गेर,
वु पहाड़ी शेर।   


सुबेर उठी-उठीकी बीड़ी खुजा
यत फिर हुक्का गुड़गुड़ाण,
फ़्योर लुट्ट्या खुजाण,
       निराळी दिनचर्या तैकि……   
दगड़्यों दगड़ी अनपैट ह्वे जांदु
तुरंत नाश्ता-पाणी खैकि…….
जनानी की डॉरो 
दगड़्यों  कै यख रात बितौंण  
जु ह्वे जौ भिन्डी अबेर,
 वु पहाड़ी शेर।

Friday, December 12, 2014

छ्वीं











भौं कखि नी लुक्याकर मी देखिकी,
मिन तेरी तर्फां देखुणु छोड़ियाली,
जिकुडी तैं जथगा भी चसु लागु, 
मिन आँखि सेकुणु छोड़ियाली। 
त्वे तैं कख - कख नी जाँण पड़दु 
पोस्टमैना पिछ्नै, मी जाणदु छौंऊ,
मेरा बाना तू भिन्डी ना पिल्सी, 
मिन चिठ्ठी लेखणु छोड़ियाली।।     

Thursday, December 11, 2014

'परचेत' !









भिन्डी टका-पैंसा मेटणैकी अत्बताट मा,
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा।  

क्वी छोड्या सुब्कदा कखि क्वी लराट् मा,   
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा। 

हाथु-खुटून सन्कोणा रैन ज्यू कणाट मा,    
खांस्दा-कणांदा दाना छोड्या बब्डाट मा ,

गौं सयाणा, अपणा-विराणा गुमणाट मा,  
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा।  

ह्यूंद बीती, बस्ग्याल ऐ  सर्ग गग्डाट मा,    
माँजी बाट्टु हेरदी रै घुंडाभाचि खाट मा, 

नी सूंणी कैकी ऊंद जाणै की रंगताट मा,
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा। 


रौली-बौळयों कू ठण्डु पाणी गम्ग्याट मा,
डांडी- कान्ठ्यों कू बथों रैगी स्वुंस्याट मा,   

रै चौक भैंसी कू किड़ाट ,गौड़ी अड़ाट मा, 
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा। 

यख़ दिन बेचैन मन्ख्यों का गब्लाट मा,
रातू नीँद औंदी नी च कुकुरा लुल्याट मा,

याद औंदी काफ्ली,कोदै रोटि कब्लाट मा,
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा।

पहाड़ी ढुङ्गा,गारा भूल्यूँ  शहरी माटा मा,  
यख अपणी ही आवाज भूल्यूं चब्लाट मा, 

आफु भी सुखि रैनी सक्युँ ठाठ-बाट मा, 
अपणा मीन सब्बी छोड्या आद्दबाट मा।

Friday, September 12, 2014

वक्त










जबारी छै स्या छोट्टी ब्वारी, 
खेल्दी छै स्या मी दग्डी गारी। 
जांदु बौण कबारी घास भारी, 
अर कबारी धाण गुठेरा,सारी।।  

जब ह्वैगी ब्वारी थोड़ा ज्वान,
आई वीं भी थोड़ा माया ज्ञान।   
पैसा-टकों मा बैठी वींकू ध्यान, 
अर भाग्युं परदेश मी भग्यान।।

ह्वैग्या अद्ध-बुढ़ेड़ अबकी बारी,
वी खेल ह्वैगी फिर सी जारी।   
यत द्वी पौड़ी जाँदा टोप मारी,
यत खेल्दी रैदां द्वी बट्टी गारी।।    

Saturday, August 30, 2014

स्याणि










इनि बांदों म की बांद तू
जन औंसी की काळी रात
पुरणमासी कू चाँद  तू, 
फैलीं च संगती मुल्क़ मा य हाम।

तेरी स्य्  स्वांणी मुखड़ी ख़ास
जन मेरा गढ़देशै की
ह्यू सी लदगद ह्यूंदया मास
सैरी हिवाळी डांडी हो तमाम।

अर मी हरवक्त बस, 
ई स्याणि करदि  रैंदु 
काश, मैं वूँ रौंत्याली डांड्यों पर 
अफु सैणि इन चमकैंदु   
जन क्वी व्याखुनिकु सीलु घाम। 
  

Wednesday, August 7, 2013

वू दिनु भी क्य दिन छा गाफिल !



ऊं दिनु की गाफ़िल*, बिजां औंदी याद,
जब मेरा पोस्ट-ग्रेजुएट होण का बाद,
बीस-बाइस सालौ, ज्वान गबरु होन्दु छौं,
माँ की वीं बात परैं, बुकरा-बुकरी रोंदु छौं
कि कख रैन्दि जाँणू तू रोज तन झुम्दी,  
ततुरु दिन काट्दी तू सुद्दी लंडेरु घुम्दी।
हे निर्भैगी !
और नी करि सक्दि त मटरै बिण्दू,  
कखी पुङ्ग्डॉ मा क्वी पगारै चिण्दू,
कामै चीज त तिन क्वी भि नि सीखी,
क्य पाइ तिन तथा पढि-लिखीकी ??      

 गाफ़िल*, =बेपरवाह 

Wednesday, July 24, 2013

'चीड़-पिरूल' विद्युत और उत्तराखंड !

अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हुए उत्तराखंड को लगभग तेरह साल हो चुके है। कौंग्रेस और बीजेपी ने यहाँ बारीबारी से राज किया। आज की तिथि तक कुल 2309 दिन उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार रही और 2330 दिन कॉग्रेस की। बीजेपी के चार मुख्यमंत्रियों क्रमश: सर्वश्री नित्यानंद स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, बीसी खंडूरी  और रमेश पोखरियाल ने राज किया, जबकि कॉग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों सर्वश्री एन डी तिवारी और विजय बहुगुणा ने यह सौभाग्य प्राप्त किया। लेकिन इसे उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि एक अलग राज्य बनने पर जो उम्मीदे और अपेक्षाए उसने संजोई थी, उसपर कोई भी राजनीतिक दल खरा नहीं उतरा।

अक्सर हमारा तमाम तंत्र अपनी अक्षमता को छुपाने के लिए पर्याप्त धन और सुविधाओं के अभाव  का रोना रोता रहता है। लेकिन अगर इच्छाशक्ति हो, मन में अपने क्षेत्र, राज्य  और देश को सशक्त बनाने का जज्बा हो तो सीमित स्रोतों से सरकार को सालाना मिलने वाली आय भी राज्य के विकास में एक महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकती है। उत्तराखंड में चीड़ के जंगलों की बहुतायत है। उत्तराखंड वन विभाग के अनुमानों के अनुसार उत्तराखंड के  १२  जिलों के १७ वन प्रभागों के करीब ३.४३ लाख हेक्टीयर जमीन पर चीड के जंगल हैं जिनसे प्रतिवर्ष करीब २०. ६०  लाख टन पिरूल (Pine needles), बोले तो चीड की नुकीली पत्तियाँ और स्थानीय भाषा मे कहें तो 'पिल्टू' उत्पन्न होता है।

पहाडी जंगलों में इस पिरूल के भी अपने फायदे और नुकशान है। वसंत ऋतू  के आगमन पर चीड के पेड़ों की हरी नुकीली पत्तिया सूखने लगती है। मार्च  के आरम्भ से ये पेड़ों से झड़ने शुरू हो जाते है और यह क्रम जून-जुलाई  तक चलता रहता है। जहां एक और सड़ने के बाद यह पिरूल जंगल की वनस्पति के लिए आवश्यक खाद जुटाता है  और बरसात में पहाडी ढलानों पर पानी को रोकता है, वहीं दूसरीतरफ यह वन संपदा और जीव-जंतुओं का दुश्मन भी है। आग के लिए यह बारूद का काम करता है और एक बार अगर चीड-पिरूल ने आग पकड़ ली तो पूरे वन परदेश को ही जलाकर राख कर देता है। सूखे में यह फिसलन भरा होता है और गर्मी के दिनी में पहाडी ढलानों पर कई मानव और पशु जिन्दगियां लील लेता है। कुछ नासमझ सैलानी बेवजह और कुछ  स्थानीय  लोग बरसात के समय नई हरी घास प्राप्त करने के लिए जान-बूझकर इनमे आग लगा देते है।

लेकिन आज की इस तेजी से विकासोन्मुख दुनिया  में चीड-पिरूल हमारी बिजली  और ईंधन की जरूरतों को पूरा करने में एक अहम् रोल अदा कर रहा है/कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ बारह टन पिरूल एक पूरे परिवार के लिए सालभर का ईंधन(लकड़ी का कोयला), ८ MWh (प्रतिघंटा) यूनिट बिजली और एक आदमी के लिए सालभर का रोजगार उत्पन्न करता है। एक अनुमान के अनुसार अगर हर वन क्षेत्र के समीप  एक १०० कीलोवाट का चीड-पिरूल विद्युत संयत्र लगा दिया जाए और १०० प्रतिशत पिरूल उत्पादन का इस्तेमाल बिजली उत्पन्न करने हेतु किया जाए तो इससे उत्तराखंड में करीब ३ लाख पचास हजार कीलोवाट से चार लाख किलोवाट बिजली उत्पन्न  की जा सकती है। आपको मालूम होगा कि एक सामान्य घर में २ कीलोवाट का बिजली का मीटर पर्याप्त होता है, खासकर पहाडी इलाकों में जहां अक्सर पंखे/कूलर चलाने की जरुरत भी नहीं पड़ती। इसका तात्पर्य यह हुआ कि डेड से दो लाख घरों में बिजली सिर्फ पिरूल संयंत्र से ही पहुंचाई जा सकती है ।  इतने तो पूरे उत्तराखंड में घर ही नहीं है तो जाहिर सी बात है कि बाकी की बिजली ( बांधो से प्राप्त विधुत के अलावा) एनी राज्यों को निर्यात कर सकते है। हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा वो अलग, वन संपदा को आग से बचाया जा सक्रेगा, वो अलग।         
                                 
Firing Up Dreams
पिरूल गैसीकरण प्लांट जिसमे पिरूल को छोटे टुकड़ों में काटकर डाला जाता है और उत्पन्न ऊर्जा को विद्युत लाइनों में पम्प कर दिया जाता है 

अब आते है इन सयंत्रों की लागत और उसके लिए आवशयक वित्त स्रोतों पर। १०० से १२० कीलोवाट  के  एक चीड़ -पिरूल विद्युत संयत्र की लागत करीब ४ करोड़ रूपये है। और उत्तराखंड में उपलब्ध कच्चे माल की कुल उत्पादन क्षमता(३५०००० कीलोवाट अथवा ३५० मेघावाट) प्राप्त करने के लिए करीब ३००० ऐसे संयंत्रों की  जरुरत पड़ेगी। यानि कुल वित्त चाहिए करीब एक ख़रब डेड अरब रुपये। माना कि जून २०१३ में आई उत्तराखंड प्रलय के बाद परिस्थितियाँ भिन्न हो गई है, किंतु अगर हम इस देश के पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों पर भरोसा करें तो अकेले सन २०११ में करीब २ करोड़ ६० लाख यात्री उत्तराखंड भ्रमण के लिए पहुंचे थे। ज्यादा नहीं तो मान लीजिये कि प्रति यात्री ने वहाँ औसतन हजार रूपये खर्च किये, तो सीधा मतलब है कि  कुल पर्यटन विक्री या लेनदेन उस वर्ष में उत्तराखंड की करीब पौने तीन ख़रब  रुपये था। अब मान लीजिये कि मिनिमम  १० प्रतिशत राजस्व ( टैक्स इत्यादि) इस लेन-देन से सरकार को प्राप्त हुआ तो कुल हुआ पौने तीन अरब रूपये। तो अगर सरकार सिर्फ इसी धन को भी चीड-पिरूल विद्युत परियोजनाओं पर लगाए तो प्रतिवर्ष करीब ५०-५५ संयत्र लगा सकती है। वैसे भी एक अकेली बाँध परियोजना खरबों रुपये की बनती है। 

अफ़सोस कि इस दिशा में अभी तक कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया गया है। अवानी बायो एनर्जी नाम की एक प्राइवेट संस्था   इस दिशा में तमाम तकलीफों के बावजूद उत्तराखंड में हाथ-पैर मार रही है, प्रयास हालांकि उनका बहुत ही सराहनीय है। और शायद इस जुलाई अंत तक १२० कीलोवाट का उनका एक संयंत्र पिथोरागढ़ के त्रिपुरादेवी गाँव में काम करना शुरू भी कर देगा, मगर हमारी सरकारे कब जागेंगी, नहीं मालूम !  



छवि गूगल से साभार !             

Thursday, July 4, 2013

तू कैमा निबोली, त्वेकुणि म्यार सौं च।





आपणि जिकुडी मा बसायुं, इक त्य़ार नौ च,
पर तू  कैमा निबोली, त्वेकुणि  म्यार सौं च।

दिल त त्वे अपणु मिन, पैली ही दियाली छौ, 

जन्मपत्री भेजीं बाबा न, तन्त बतेरी जगौ च।

रौंत्याळा त बतेरा ह्वाला,गौं डांडी-काँठ्यो मा,
पर  सुपिनौ मा रिङ्ग्दु, सिर्फ तेरुहि  गौं  च।

जौं आँखियोंन ह्यूंद भी कभी, पाळु नी ढ़ोळी,
यादमा तेरी, वूं आँखियों मा, लग्दी सगौं च।

गौ-गौळा, बौण-पंदेरों हिटदू, लोग घूर्दी रैंदन,
पूछिनिहो जैन,त्व़े क्य ह्वाई, ईनि क्व़ा मौ च। 

होण लग्युं भारत निर्माण !









सोचि-सोचिकीतैं सूखिगेछा जब वीँका प्राण,  
निम्दैरी मा बैठीकि, बोड़ी लगीं छै बरणाण। 
कन निर्बिजु ह्वे बोला दूं ये निर्भागी सरगौकू, 
न बौण जाणकू रै, न डोखरी-पुंग्डियो धाण।      
चूचौं,कन अचांणचक या ळोळी प्रलय आई, 
छोड-पुंगडि गैन बौगी,अब हमुन क्य खाण।
मुन्ड़ेली मा बैठी बोड़ा हुक्का छौ गुगणाणू,
कूड़ा ढीस्वाळ एक हैलिकॉप्टर लगी उड़ाण। 
बोडन बोडी तै आँख मारी,हैलिकॉप्टर दिखै,
अर मुसकरैक बोली; हो रहा भारण निर्माण।।   


Saturday, June 29, 2013

हे धारी माता !

उपरोक्त चित्र एक काल्पनिक चित्र है, असली और नकली का समिश्रण ! 











उन्त हे देवी माँ, तेरी महिमा न्यारी माता, 
पर तेरी  पीड़ा  नी जाणि कैन धारी माता !
यूंन बोली,माताकु मंदीर हम इन बणौला, 
काटीकी पौड़,स्यूं मंदीर  हम ऐंच उठौला।  
क्य जाण्ण छौ इन उठाला यूं थान माता , 
रखी नी जाणी कैन भी तेरु  मान माता। 
विराट ज्यू च तेरु,त्व्ही सबुतै तारी माता, 
तेरी  पीड़ा  नी जाणि  कैन, हे धारी माता ! 


उत्तराखंड विपदा- हे स्वर्ग दिदा !


















उत्तराखंड त्रासदी मा जू  ज़िंदा यात्री लोग फंसी छा ,वू त  वख बिटिकी फौजी लोगुन लगभग निकाल ही यालिंन, परन्तु जू वख का स्थानीय  लोग छन  वून  कख जाण ? वूंकी  खैरी  कुछ यूं शब्दू मा ;
    

हे स्वर्ग दिदा,इ तिन क्य कैइ,तौं चौखम्बा बौंण,
बरखा-बौ  त  छक्कीक रुवेगी, हमुन  कै तै  रोण । स्वर्ग दिदा ....!
कूड़ी, डोखरी-पुङ्ग्डी बौगी, हे कुठारी बौगी दोंण,    
बरखा बौ त  छक्कीक रुवेगी, हमुन  कै तै  रोण । स्वर्ग दिदा ....!
खाँण क्या च, सेण कख, मुण्डभी कख छिपौण,
ज़रा तौळ देख, कुछ नी  रैंयुं,  टोटगी कर मोण,   
बरखा बौ त छक्कीक रुवेगी, हमुन  कै तै रोण । स्वर्ग दिदा ....!
रूड़ी का दग्ड़ा-दग्डी,इन कैरी तिन रग्डा-भग्डी,
अषाढ ल्हीगी सब्बी बगैकी, सौंण क्या बगौण,   
बरखा बौ त छक्कीक रुवेगी, हमुन  कै तै रोण ।  स्वर्ग दिदा ....!
बिज्वाड़ ज्व़ा बूती मिन,सेराकी पुङ्ग्डी बौगीन 
बीजौ  कू  निर्बीजू  ह्वाई, क्य बुतण, क्य ळौण,
बरखा बौ त छक्कीक रुवेगी, हमुन  कै तै रोण ।  स्वर्ग दिदा ....!
मैङ्गैकी च मार यख, ढंगैकी नी सरकार यख, 
दिनी भी छै जु मदद कैन, जुग्ति ह्वै  देरादोंण,     
बरखा बौ त छक्कीक रुवेगी, हमुन कै तै रोण ।  स्वर्ग दिदा ....!

Monday, June 17, 2013

बिजोक !


















उन त मी भी रजामंद छौ, अर वा भी रजामंद छै,

जथ्गा वीं मैं पसंद छौ, उथ्गी मी भी वा पसंद छै,

इन कु जाण्दु छौ कि सदानी अपणा मनै नी होंदी,

ब्यो नि ह्वाई,टैम पर पौंछ नि सक्यु, सड़क बंद छै। .