Thursday, December 28, 2017

गैरसैंण पर नेता जी की सफै !

एक छोटिसी उत्तराखंडी  कविता :          
गैरसैंण पर नेता जी की सफै !

हाँ, हमतै दून बिटिकी लगाव छ,
परन्तु पाड़ों से थोड़े हमतै "वैर" ठैरा,
अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।

अरे ग्याड़ों, तुम क्य जाणदै, हम जाणदां .......
गुजारु नी च हमारु वांका "वगैर" ठैरा,
चुनौ लड़णों क त हमन वक्खी जाण, 
जु नि जाला वख त हमरी "खैर" ठैरा।    


अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।

भितरा-भीतरी त हम भी बगोळ्या छां,
पर बथै  नि सक्दां  "भैर" ठैरा ,
पांच साल त खैंचि  ही द्याळा 
पर वांका बाद क्य ह्वालु, यू "डैर" ठैरा।
अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।

बल वा पिकनिक, सपाटै की जगा च,
ये वास्ता हर साल जांदां करनौ "सैर" ठैरा,
फिर भी वख जाणै की कुछ मन्ख्योंकि 
पतानि किलै गाडिच या "ळैर" ठैरा।     
अब हम भी क्य करां ...........
वीं जगा राजधानी ही नि जाण चांदि ,
जै जगा सैंण ही 'गैर' ठैरा।
     -पी सी गोदियाल 'परचेत'  
  


Sunday, August 9, 2015

खुली चिट्ठी उड़्यार जी के नाम !


दिनांक: ०१/०८/२०१५

आदरणीय उड़्यार जी,
सादर चरण स्पर्श। सर्वप्रथम आत्मरक्षा बाद को अन्य कार्य हैं।
मैं यहाँ पर सपरिवार कुशल से हूँ और आशा करता हूँ कि आप भी तहाँ पर हीसर, किन्गोड़ और तुंग के बोटळौ तथा बांज और चीड़ के दरख्तों के साथ कुशल-मंगल होंगे।

आदरणीय उड़्यार जी, जबसे उत्तराखंड से लौटा हूँ एक अजीब सी आत्मग्लानि मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है। और उसी का नतीजा है कि मैं यह खुला पत्र आपको लिख रहा हूँ इस उम्मीद के साथ कि आप न सिर्फ सहृदय और परोपकारी है अपितु क्षमाशील भी है, और मुझे अवश्य ही माफ़ कर दोगे।
उड़्यार जी, आप बहुत बुजुर्ग है और इस बात को शायद मेरे से भी ज्यादा भली भाँती समझते होंगे कि अपना मुल्क अपना ही होता है। और खासकर वह मुल्क, जहां आपने अपना अधिकाँश बचपन अपने प्रियजनों और बाल दोस्तों के साथ व्यतीत किया हो, शायद जान से भी ज्यादा प्यारा होता है। इंसान भले ही जिंदगी के लक्षित तमाम मुकाम ही क्यों न हासिल कर ले, किन्तु अपने प्रियजनों की ही भांति देर-सबेर उस मुल्क की याद उसे विचलित कर बैठती है, जो कभी उसका बचपन का यार था। और वह उससे मिलने के बहाने ढूढ़ने लगता है।

ऐसे ही कुछ, गत माह मैं भी उत्तराखंड अपने गाँव से मिलने आया था। सुबह करीब १० , १०:30 बजे पहाड़ पर मौसम ने करवट ली और तेज बारिश शुरू हो गई। अपने गाँव और आपके समीप ही था कि गाडी का टायर पंक्चर हो गया। गुस्से में उस वक्त तो उसे अपना दुर्भाग्य समझ किस्मत को बहुत कोसा था, परन्तु बाद में उसे अपना सौभाग्य इसलिए समझने लगा कि इसी बहाने मुझे आपके दर्शन हो गए थे। अकेला होता तो शायद गाडी में ही बैठकर बारिश के बंद होने का इन्तजार करता, किन्तु बच्चे साथ में होने और भूस्खलन के खतरे की वजह से दिमाग पर विकल्प चुनने का जोर बढ़ने लगा था। गाडी के शीशो पर बारिश की वजह से बहुत आदर्ता होने की वजह से दृश्य शून्यता थी और मैं उस तेज बारिश में ही बाहर आकर इधर-उधर नजर दौड़ाने लगा था। और तभी मुझे आप नजर आ गए।

आपको भी शायद याद हो कि मैंने 'आव देखा न ताव' और बच्चो को तुरंत गाडी छोड़ने को कहा और हम सभी उस तेज मूसलाधार बारिश से बचने के लिए आपकी तरफ भागे चले आये थे। आपकी चौखट पर पहुँचने से पहले मेरी धर्मपत्नी का पैर फिसला था और आपने अपनी वयोवृद्ध सदी हुई मधुर आवाज में कहा था , "अंक्वैकी, मेसी परै " (संभलकर, आराम से ) ! आपकी शरण में कुछ पल ठहरने के बाद हालांकि हम लोग गंतव्य को निकल चले थे किन्तु मैं यह कैसे भूल सकता था कि वह पवित्र स्थान मेरे लिए अपने घर से ज्यादा चिर परिचित था। वो बात और थी कि सभ्यता और बदलाव की आंधी में चूर, मैं भी आपके समक्ष यह दिखाने का नाटक कर रहा था कि मैं तो तड़क-भड़क में रहने वाला एक शहरी बाबू हूँ।

नि: संदेह, आप मुझे इतने सालों बाद कैसे पहचानते ? किन्तु, वो मेरी मूर्खता और स्वार्थ था कि मैंने जान-बूझकर अपना परिचय आपको नहीं दिया। क्योंकि एक डर मुझे अंदर से खाए जा रहा था कि कहीं हमारे ये पहाड़ी बुड्या जी, मेरी बचपन की पोल मेरे परिवार, मेरे बच्चो के सामने न खोल दें। अंग्रेजी में एक कहावत है " ओल्ड हैबिट्स डाई हार्ड" अर्थात पुरानी आदतें आसानी से नहीं जाती और वो मेरे से भी जुदा नहीं हो पाई। गलतियां और बेवकूफियां करने के बाद जो डर बचपन में लगा रहता था, वो आज भी अंदर मौजूद है।

कैसे भूल सकता हूँ कि बचपन में जंगल में गाय, बकरिया चुंगाते वक्त जब कभी बारिश आ जाती या फिर तेज धूप पड़ रही होती तो मैं अपने बाल-सखाओं संग तुरंत आपकी शरण में आ जाता था। और तो और, जिस दिन स्कूल जाने का मूढ़ नही होता था, पूरी मंडली छुपने (लूक्णौ तै, जिसको यहां शहर के सभ्य लोगो की भाषा में 'बँक मारना' कहते है ) के लिए आपकी शरण में ही आते थे। मुझे याद है, नटखट दोस्तों संग हम कच्चे केले का पूरा फिर्क (डांठ ) गांववालों के बगीचों से चुराकर आप ही के आँगन में गड्डा खोदकर पकाने हेतु रख देते थे और फिर छुटटी के दिन मंडली गाय, बकरिया चुगाने के बहाने आकर, ठाठ से आपकी छत्र-छाया बैठ, पके केलों का आनंद लेती थी।

आदरणीय उड़्यार जी, आपको शायद यह भी याद होगा कि चढ़ती जवानी के शुरूआती दिनों में मैंने प्यार ढूढ़ने की पहली असफल कोशिश भी आप ही की छत्र-छाया में की थी, हालांकि वह परवान नहीं चढ़ पाया था। अपने पैरों पर खड़े होने के अरमान लिए जब मैं पहली बार गाँव से निकला था तो 'बारह बजे के गेट' ( दोपहर की बस) की खिड़की से नम  पलकों से मैंने अपने गाँव, खलियान   और जंगल के साथ-साथ आपको भी निहारा था। पिछले महीने आपसे अचानक हुए मिलन और आपको खुद का परिचय न देने की बेवकूफी पर मुझे अपने ऊपर इतना क्रोध आया कि मैं अपनी आत्मा को कई रोज बार-बार धिक्कारने से नहीं चूका।

मुझे आप पर भी गुस्सा आ रहा था कि जिस तरह उस समय जब मैं अविवाहित  था और शहर से बहुत समय तक अपने गाँव छुट्टी लेकर नहीं जाता था तो मेरी माँ और दादी तुरंत मुझे पत्र लिखकर पूछते थे कि ;
सूट-बूटु की चमचम अर
लैण-खाण का भौर,
भिन्डी साल ह्वैग्या त्वे
परदेश गयां छोरा,
कब आलू चुचा घौर।
ना खै-कमैकी जाणी,
सुद्दी-मुद्दी की श्याणी ,
दुनिया की देखा-देखी
अर पड़ोस्यों की सौर ,…… भिन्डी साल ह्वैग्या त्वे ……।


और मैं तुरंत ही छुट्टी लेकर  गाँव का रुख कर लेता था। मुझे क्रोध आपपर इस बात का आया कि भले ही मैंने आपको भुला दिया हो किन्तु आपने क्यों नहीं कभी मुझे कोई खत लिखा ? खैर, मैं आशा करता हूँ कि आप मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे। आप अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना , पहाड़ों में आजकल बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बहुत बढ़ गई है, अत: आप  अपनी होश्यारी से रहना । अबके जब  गाँव आऊंगा तो आपके दर्शनार्थ अवश्य आऊंगा।  इसी वादे के साथ, 

आपके अहसानो तले दबा
आपका अपना ही
-एक अहसान फरामोश पहाड़ी !

Saturday, December 13, 2014

पहाड़ी शेर


गढ़वाली कविता : - पहाड़ी शेर !
घरवाळी का अग्नै 
जू ह्वै जौ ढेर, 
वु पहाड़ी शेर।  


बाघ बुल्दन लोग 
तख  भी  वै तैं,

कुछ डब्राण्या-कब्रांण्या,
कुछ चौंर्या बाघ........
घरवाळी 
गुगरांदी जब 

त गिचा बिटिकी तैका 
निकुल्दु झाग.....
गिचु पोंछींकी 
मैदान मा ऐकी तै   
जू डट जौ फेर,
वु पहाड़ी शेर।  



 तैतैं खैंडणौ कु 
बिजां शौक़ च,
       तैडू,पिंडाळु कुछ भी ......  
जब कुछ न मिळु त
          पड़ोस्योकि ही खैंडण लग्दु …....  
न्त काळु सी रैंदु बण्यू  
पर टिंचरी का द्वी पैग 
पेट उन्द गै नी कि  
झट्ट भगवतगीता कु 
पाठ सुणौंण लग्दु .......
पी-पीकी बोंज पिचक्यां  रैंदा 
पर भकांई रैंदी गेर,
वु पहाड़ी शेर।   


सुबेर उठी-उठीकी बीड़ी खुजा
यत फिर हुक्का गुड़गुड़ाण,
फ़्योर लुट्ट्या खुजाण,
       निराळी दिनचर्या तैकि……   
दगड़्यों दगड़ी अनपैट ह्वे जांदु
तुरंत नाश्ता-पाणी खैकि…….
जनानी की डॉरो 
दगड़्यों  कै यख रात बितौंण  
जु ह्वे जौ भिन्डी अबेर,
 वु पहाड़ी शेर।

Friday, December 12, 2014

छ्वीं











भौं कखि नी लुक्याकर मी देखिकी,
मिन तेरी तर्फां देखुणु छोड़ियाली,
जिकुडी तैं जथगा भी चसु लागु, 
मिन आँखि सेकुणु छोड़ियाली। 
त्वे तैं कख - कख नी जाँण पड़दु 
पोस्टमैना पिछ्नै, मी जाणदु छौंऊ,
मेरा बाना तू भिन्डी ना पिल्सी, 
मिन चिठ्ठी लेखणु छोड़ियाली।।