Monday, December 21, 2009

ठेस !

आज के अखबारों में यह खबर पढ़कर दिल को ठेस पहुँची ! एक वक्त था, जब मैदानी क्षेत्रो में पहाड़ के लोगो, खासकर गढ़वाली और कुमावनी को नौकरी पर रखने ( चाहे वह घरेलू नौकर की नौकरी हो अथवा दफ्तर के कर्मचारी की) का एक ख़ास मकसद यह होता था कि ये लोग ईमानदार होते है ! लेकिन आज यह भी खबर पढनी थी ! इसका दूसरा पहलू इस तरह भी देखा जा सकता है कि देश की आर्थिक और बेरोजगारी की स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है ! लेकिन सत्ता में बैठे लोग मौज कर रहे है, बेफिक्र होकर !




खबर हिंदुस्तान के सौजन्य से !

Sunday, November 22, 2009

सी बूंद तौं गलोड्यों मा !


त्वै मेरी बांद, मी बतौण ही पड्लु कि
आज इथ्गा उदास किलै च तेरु मन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

मी सी कनी कैकि भी नि छुप्ये सकदीन
तु ढौक जथा भी तौं तै धोति का पल्लन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

यु हैंस्दु बुरांस भी तन किलै मुरझायुं
घाम छैलेगि हो रौली-बौल्यों कु जन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

आज मी तै यख बिटी अडेथ्ण का बाद
कब तक रुऔली तु तौं आंखियों तै तन,
सी तरपर ओंस तेरी आंखि छ्न ढोल्णी
कि तौ गलोड्यों मुंद बूंद सी, बरखैगी छन ।

तेरा जाण का बाद, अकेली रालू जब मै
मी तेरी याद का सुपिना आला कन-कन,
यी तरपर ओंस जु मेरी आंखी छन ढोल्णी
दग्ड्या तेरी खुदमा मेरा दिल की बाडुली छन ।

Sunday, November 1, 2009

मिन नी घड्काई आज !

तन किलै रडकाई तिन सी, पीठी मकौ भारू,
मिन नी घड्काई आज, गोरख्याणी कू दारू,
मेरु क्वी नी दोष गैला दोष दग्ड्यों कु सारू,
भलु मन्खी बणिग्यों चुची, अब मी बिचारू,
तेरी कसम, तु जै का मर्जी सौं खिलै ली,
मिन आफु नि पिनी दग्ड्योंन पिलै ली,
कुछ भी नी रैयूं अब मेरा कीसा परै,
तु जथगा मर्जी तै बटुआ हिलै ली,
अब कुछ नि रैगी पैण कु चारू,
तन किलै रड्काई तिन,
स्यू पीठी मकौ
भारू,
चुची,
भलु
मन्खी बणी
ग्यों अब मी बिचारू !
मिन नी घड्काई आज
चुची,गोरख्याणी कू दारू!!

Wednesday, October 7, 2009

भोले पहाडी !

"अरे बेटा, अपना वो गुजरा ज़माना भी क्या ज़माना था, प्रगति की रफ़्तार सब बहा कर ले गई !" अपने उस सुदूर आँचल के किसी वयो-वृद्ध के समीप कुछ पल के लिए फुरसत से बैठो और आत्मीयता से उनकी बातो में लगाव दिखावो, तो समय के थपेडो से खंडहर में तब्दील हो चुके, गुजरे जमाने का वह सैलाब बर्फ की तरह पिघलकर किसी हिमालयी ग्लेशियर से बहकर बाहर निकलने लगता है! गुजरे युग की वो बाते जो आज की पश्चिमी सभ्यतापरस्त पीढी सुने तो, उसको महज एक मजाक दिखे ! लेकिन कल की वो एक हकीकत थी, एक कड़वी हकीकत !

वो वृद्ध आँखे, कुछ याद करने के लिए झुर्रियों की परतो में दबे मस्तिष्क पर जोर डालकर कहना शुरू करती है; बेटा, बहुत भोले-भाले और सीधे लोग थे, उस जमाने में ! जब बासठ की लड़ाई लगी थी, चीन माणा तक घुस आया था, तो उस जमाने में देश में बहुत कम लडाकू हवाई जहाज थे! जब कभी वायुसेना का कोई लडाकू जहाज ऊँचे पहाडो के ऊपर से गुजरता तो लोग सहम जाते, मवेशी विदक जाते थे! स्थानीय लोग कोई बड़ा गरूड पक्षी उस जहाज को समझते और कहते कि
हे गरूड तू इस तरह से "सू" की ध्वनि से मेरे घर के ऊपर से गुजरकर मेरे मवेशियों को डराता है ;

किले जाणु छै गरूड मेरी मरोड़ी का ऐंच सै,
इन न डरो चुचा गरूड, मेरी गौड़ी-भैंस्यु तै !

१९३० के भीषण अकाल के बाद पहाड़ के लोगो की स्थिति भी जर्जर हो गई थी! गरीबी में गुजर बसर करता एक गरीब अपने मन के उदगारों को कुछ इस तरह से व्यक्त करता है कि हे गरीबी, तू कब मेरा साथ छोडेगी;

हे गरीबी, चूची गरीबी, राली कब तकै तू मेरा साथ मा !
एक ऊ भी दिन भी आलू, जब तू आली मेरा हाथ मा !!
ओढूणु नी च, बिछोंणु नी, ठंडन छोरा रोंदन रात मा !
भांडू नी च, कूंडू नी च, खाणु खांदा मालू पात मा !!
गलू भिगोण्नो कु साग नी च, खाई लोण राली भात मा !
लत्ती नी च, कपडी नी च, नौना घुम्दा नांगा गात मा !!
हे गरीबी, चूची गरीबी, राली कब तकै तू मेरा साथ मा !
एक ऊ भी दिन आलू, जब तू भी आली मेरा हाथ मा !!


देश में स्वतंत्रता का दौर आया, ये आजकल के ज्यादातर हराम का खाने वाले नेता तो बस, भ्रष्ट तरीके अपनाकर घर भरने और जल्दी अमीर बनने की गरज में नेतागिरी में उतरते है, लेकिन उस दौर का जो युवा नेतागिरी में उतरने की सोचता था, उसका पहला उदगार जो मुख से निकलता, वह यह होता था कि मैंने भी अपने पिछवाडे पर डंडे खाने की कसम खा ली है, अतः मैं नेतागिरी करने जा रहा हूँ !

बड़ा-बड़ा भारत का नेता ह्वैन,
छोटा-छोटो कु खेल जी,
महात्मा गांधीन सीखी याली
चरखा कातण बेल जी !
जनानियों सीखी याली,
लच्छा जम्बत साडी जी,
मर्दों न भी मूछ मुंडाई,
अर् साफ़ बणाइ दाड़ी जी !
झीला-झाला सुलार झुलेंदा
पूठो मा कोट जी,
होण लगी वख तभी
तौंकी चटा-चट चोट जी !

वहीं दूसरी तरफ देश-रक्षा का जज्बा लिए युवक जब फौज में भरती के लिए आगे बढ़ते तो अपने परिवार से कहते कि ;
धर दे मांजी तू मैंकू रोट
छोड़ दे प्यारी तू मेरु कोट,
कूट दे प्यारी चूडो की घाण
भोल सुबेर जरुरी जाण,
सीखा सिपाहियों तुम बिग्लू कि बोली
भोल तुमारी हाजरी होली,
खावा सिपाहियों तुम काचु प्याज
चलोंण तुमुंन पाणि कू जाज,
नी औंण प्यारी तुमुंन साथ
तुम छा प्यारी जंनानी जात,


बेटा, अपना ये दर्द अब किसे सुनाये, किसी के पास समय ही नही है ? एक लम्बी आह भरकर वह वृद्ध आखो पर छा गई गीली परत को सांफे से साफ़ करने लगे थे !

Monday, October 5, 2009

न हाथीन स्वीली जाण, न बदरू दादन बजार आण !

अपना गढ़वाल की या एक पुराणी कहावत अचानक याद ऐगी, या कहावत भी कुछ वीं कहावत सी मिल्दी-जुल्दी च कि 'न बुबन ब्याण, न भुला होण !' ठीक उन्नी य कहावत भी च कि 'न हाथीन स्वीली जाण, न बदरू दादन बजार आण' !

ईं कहावत का पिछ्नै की कहानी या च कि रुद्रप्रयाग का ठीक पलिपार खड़ी चडाई चढ़न का बाद ऐंच डांडा माँ एक गों पड़दू स्वीली ! ये गौं माँ डिमरी लोग रंदन! बहुत पैली ये गौं माँ एक बदरू दादा रंदा छा ! काफी झाड्फूक और तंत्र-मन्त्र जाणदा छा ! उंगी ख्याति आखिर टीरी का राजा तक पौंछि और राजन वो तै अपणा दरवार माँ पहुंचण कू हुक्म सुणइ, जब अर्दली हुक्म लीग तै स्वीली पहुंची त बदरू दादन राजा तै रैबार भेजी कि जब तक मैं लेण कु हाथी नि आलू मैं दरवार माँ नि ऐ सक्दू ! अब समस्या इ खड़ी ह्वैगी कि आखिर वे खडा डांडा माँ हाथी पौछ्लू कन माँ ? त न कभी स्वीली हाथी गै सकी और न बदरू दादा बजार ऐ !

Sunday, September 13, 2009

गढ्वाली कविता- बिसरीं याद !

दिल मे छुपी एक कसक यहां बयां कर रहा हूं, जिसकी बिडम्बना यह है कि आज की हमारी जो पढी-लिखी पीढी है, जिनके पास इन्टरनेट की सुविधा है, जिसे उनके समक्ष अगर प्रस्तुत करु भी तो वो उस मर्म को समझ नही पायेंगे । और जो उस दर्द को समझ सकते है, वे पढ नही सकते, उनके पास इन्टरनेट नही है ।
ऒंट पे लिये हुए, दिल की बात हम,
जागते रहेंगे और कितनी रात हम,
मुक्तसर सी बात है मुझे अपने गांव से प्यार है …………………..!



याद आन्दा उ पुराणा बचपन का दिन,
फ्योर खाण्कु तै तरसदु यु उल्यारु ज्यु,
पठोडा की दै-छांछ, सिन्द्री कु दूध,
अर कर्कुरु-मर्मुरु भ्योंपाणी कु घ्यु !

थाला-चिलेडी की घस्यारियों का सुरीला गीत,
वूं हरी-भरी मंजरा-मंसारी की धार मा,
कन्दूड तर्सदन फ्योर सुण्णकु तै बैठी की,
गोरु-बाखरा चरौंदी दा, कै धैडा-उढ्यार मा !

दादा कु हुक्का कु गुग्ड्याट, गंडासू कु तम्बाकु,
ठुंगार लगौण्कु रोटि मा, डांडा कु प्याज,
सुपाणा, चौरासू का उ तिल और दाल,
कखै खाण कंडाली कु लड्बुडु काफ़्लु आज !

बस्गालै की रौली-बौली, गाड-गद्रियों मा,
छोटी माछी-गड्यालु का पिछ्नै की झख,
ढुंगी –डल्यों का नीस बिट्नैकी,
कुत्डा-लिग्डा मेट्णैकी टक !

बरखदा दिन पर डिंडाला मा बैठीक,
अगेठी मा मुग्री-भट भुज्णका बाद,
गारी-सगोड्यों मा जगा-जगौं पसरयां,
मार्छा-पिंडालु का चर्चरा पैतूड कु स्वाद !

पुंगड्यों बिटिक चोरीक, काख्डी अर फूट,
अमेड्थ-भुजेला चोर्या, चौडीक कूडा,
स्कूल जांदी दा कीस्यों मा भौरीक,
गुड की गेन्दुडी अर कौणी का चूडा !

कुल्लन खाड खैन्डीक ढूढ्दा छा तैडू,
सगोड्यों का कोणों मा उ ढूढ्णु च्यु,
याद आन्दा उ बचपन का पुराणा दिन,
फ्योर खाण्कु तै तरसदु यु उल्यारु ज्यु !

Wednesday, June 24, 2009

दो पहाडो की आपसी अस्पृश्यता !

बात बहुत छोटी सी है, मगर है बहुत गहरी! यूँ तो सदियों से हमारा पूरा का पूरा भारत बर्ष ही छुआछूत की इस अजीबोगरीब बीमारी जैसे क्षेत्रवाद,जात-पात, ऊँच-नीच, रंग-भेद तथा गरीब-अमीर से गर्षित रहा है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में बसे दो पहाडो, गढ़वाल और कुमाऊ के मध्य की अस्पृश्यता एक भिन्न तरह की बीमारी है !यूँ तो भले ही कहने को ये दोनों पहाड़ एक ही है, और मिलकर उत्तराखंड राज्य बनाते है, किन्तु इनके बीच की दूरियां भी समय-समय पर मानसपटल पर साफ़ परिलक्षित होती रही है हम भले ही, गढ़वाली और कुमाउनी मिलकर एक ही किस्म के पहाडी, उत्तरांचली अथवा उत्तराखंडी होने का राग अलपते रहे, किन्तु सच्चाई यही है कि दोनों पहाड़ कहीं न कहीं एक दूसरे के प्रति एक अलग किस्म का भाव अपने दिल में पाले है !


आवादी और क्षेत्रफल के हिसाब से गढ़वाल क्षेत्र, कुमाऊ क्षेत्र के मुकाबले काफी बड़ा है, और जब उत्तराखंड राज्य की मांग उठी, इसी मुद्दे पर बहुत दिनों तक यह गहमा-गहमी और मतभेद बना रहा कि प्रस्तावित राज्य की राजधानी गढ़वाल में हो अथवा कुमाऊ में ! अभी हाल का मुद्दा रहे श्री भगत सिंह कोश्यारी और उनके चंद कुमाउनी विधायक मित्र, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जनरल खंडूरी को हटाने में कोई कसर नहीं छोडी और साथ ही कोश्यारी जी को जब अपने पक्ष में हवा बनती नहीं दिखी तो अपने एक सहयोगी श्री प्रकाश पन्त को इस आधार पर आगे किया कि पहले मुख्यमंत्री गढ़वाल का था, अब कुमाऊ का बनना चाहिए, लेकिन अफ़सोस कि उन्हें भाजपा के ३५ विधायको में से सिर्फ कुछ का ही समर्थन प्राप्त हुआ !

राजनीति में अवसरवादिता और उसका फायदा उठाना रणनीति का एक हिस्सा हो सकती है लेकिन इस आधार पर अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए गढ़वाल और कुमाऊ के नाम पर दो पहाडो के मद्य खाई खड़ी कर देना, मैं समझता हूँ एक निंदनीय कदम है ! और प्रत्येक उत्तरांचली को, चाहे वह कुमाऊ का हो अथवा गढ़वाल का, इसे समझना होगा और इस संकीर्ण दृष्टीकोण से बाहर निकलना होगा, तभी पूरे क्षेत्र का समग्र विकास संभव है!

Tuesday, June 9, 2009

गोंद्ग्या सासु, चटोरी ब्वारी !

उतराखंड कु जिला टिहरी, पट्टी सेरा,
अर् गौं कु नौ छौ धारी,
गौं माँ रन्दि छै एक गोंद्ग्या सासु,
अर् वींकी एक चटोरी ब्वारी

गोंद्ग्या सासु इन छै कि जख मिली,
वीं तै गोन्दगी, खाण कु,
वै घर मा स्या पसरी जांदी,
नौ नि लेंदी छै जाण कू

अर् ब्वारी इन चटोरी छै कि,
कोश्डी परौ भी लोण,
आंग्लीन चाटण, जती दा भी,
वींन भैर-भीतर औण

नौनु छुट्टी घौर आई,
बुबा कोरी रोट्टी खांदू पाई,
पूछी वेंन बबा तै,
कि ब्वारीन तुमतै दाल नी दयाई

बुबान नौना तै बोली बबा,
सासू कु नौ च उछिना, अर् ब्वारी कु बिछना,
गौं मकै यौक बाँट हड्गी लै छौ,
अर् खांदी दा कुछ ना !!!!

( त यी हाल छा वूँ द्वी गोंद्ग्या और चटोरी सासु-ब्वारीयों का, वूँन वा एक बाँट मीट बाणोउन्दी दा ही चटके दिनी )

Tuesday, May 26, 2009

गढ़वाली गीत- तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ

खडा-खडी छुयों माना मिस्यो ,
भै तौ खुटयों ना तन कुस्यो ,
तू सरुली हे छुंयाल घस्यारी
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ ,
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ,तू घास की भारी भोंयाँ बिसौ!

डाली-पांखियों मा चौड़ी-चौड़ीक
डांडी-कांठियों मा रौडी-रौडीक,
लाणकु द्वी पूली घासकि,
कख-कख गै दौडी-दौडीक
कब तकै रिग्ली तू चारी दिसौ
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ ,
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ,तू घास की भारी भोंयाँ बिसौ!


डांडी-कांठियों मा बर्फ च
यख पालू लर्क-तर्क च,
फुर-फुर्या बतों चल्णु
बल्देणु भी सर्ग च,
भै हाती-खुट्यों ना तन चस्यो
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ ,
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ,तू घास की भारी भोंयाँ बिसौ!

न सौर कर लुकारी तू
सेट्टू की छै ब्वारी तू
घास की फिकर नी मी तै,
मीकू तै छै प्यारी तू
तै कमरी तैना तन पिसौ,
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ ,
तै घास की भारी भोंयाँ बिसौ,तू घास की भारी भोंयाँ बिसौ!

Monday, May 25, 2009

गढ़वाली गीत -अब ऐजा सुहा !

भेंटी जा दू मी तै सुहा, मेरा गौं का तीर मा
कब तक लुकौं चिट्ठी तेरी, काकर-सैतीर मा,

खै याली मीन भौत सुहा, विरह कु यु जैर
अब नी रयेंदु सुहा मीसी, और तेरा बगैर,

तु ऐजा अब बारात लीकी, ऐंसू का मंगसीर मा
कब तक लुकौं चिट्ठी तेरी, काकर-सैतीर मा,

फुकणी च दिन रात मी, जवानी की या झौल
बाली-तरुणी उमर सुहा, फिर नी राली भोल,

लप्स्या नि राली भोल, अर जान ये शरीर मा
लुकौं कब तलक चिट्ठी तेरी काकर-सैतीर मा

त्वै परै अटकी च साँस, त्वी छै मेरी आश
सहारू छै तुही एक मेरु, करी ना निराश,

और ना अब फिकर डाल, ये मेरा धीर मा
कब तक लुकौं छिट्टी तेरी,काकर-सैतीर मा,

भेंटी जा दू मी तै सुहा, मेरा गौं का तीर मा
कब तक लुकौं छिट्टी तेरी,काकर-सैतीर मा,

Saturday, May 23, 2009

आणु छौ मी,!

रख धीरज मेरी जुगुनी, झट त्वैमु आलु मी,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

छोडी छाडीक आणु छौ मी, तु उदास ह्वाई ना,
जल्दी होली भेंट हमारी, तु या आस ख्वाई ना,

धर्यु क्या च यी नौकरी मा, त्वै मु ही रालु मी,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

डाण्डा मा मरोडी बणौला, कूडी एक छज्जादार,
मोरी ह्वाली, चौ-तर्फ़ी, चौडी डिन्डाली वार-पार,

बौन्ड-ओब्रि, मोर-संघाड, पर नी होलु तालु क्वी,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

गला की त्वै तै हैन्सुली लालु, अर कानु की मुर्खली,
गौडी राली चौक मा, बाच्छी गुठ्यारा बुर्कुली,

मेला मा छन्छेडी परोसी, पात्ति मा मालु की,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

पुन्गडी मा ग्यों-जौ बुतला, सगोडी मा रयांस,
बांज की लाखुडी मेट्ला, अर बिट्टा परौ घास,

ठन्डी-ठन्डी हवा खाला, घणा कुलैं का डालु की,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

झंगोरु कूठी उर्ख्यालामुंद, ग्यों पिसौला जान्द्री मा,
साट्टी धारी कुठारिमुन्द, जौ सुखौला मान्द्री मा,

पोथ्लियोन सैरु भर्यु रालु, ऐंच धुर्पालु भी,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

पाणी प्योला धारा कु, गौडी-बाच्छी कूली मा,
अर टन्न करी सेंयां राला, परालै की पूली मा,

द्वी तरैका फूल उगौला गोरू भी अर कालु भी,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

ये बिराणा देश की, भाड मा ग्यै या नौकरी,
अप्णा देश बैठीकी, करला अप्णी चाकरी,

कब तकै युंकी सूणा, द्वी कौडी का लाल्लु की,
लगदु नी च त्वै बिगर, यख यु मेरु बालु जी,

Friday, May 22, 2009

उत्तराखंड क्यों नाराज है ?

उत्तराखंड की बीजेपी सरकार खासकर वहाँ के मुख्यमंत्री इस सदमे में है कि आखिर उनसे ऐसी कौन सी गलती हो गयी कि जो बीजेपी को राज्य में इस तरह की हार का मुह देखना पडा ? सड़के बनवाई, डैम बनवाये, काम में इमानदारी भी दिखाई, फिर भी....? यह अवस्य एक पेचीदा विषय बन गया होगा उनके लिए !

सरसरी तौर पर यह बात सही है कि इसमें बीजेपी की आंतरिक कलह और कार्यकर्ता द्बारा मुख्यमंत्री की इमानदारी को ज्यादा तबज्जो न देना, हार का एक प्रमुख कारण है, लेकिन उससे भी बड़ा कारण है, जनता में असंतोष ! मुख्यमंत्री महोदय को यह समझना होगा कि सिर्फ कुछ सड़के और डैम बना लेने भर से स्थानीय जनता की आकांछाये पूरी नहीं हो जाती! इतना बड़ा टेहरी डैम बना, क्या उत्तराँचल के सभी घर उससे रोशन हो गए? नहीं ! उत्तराँचल सिर्फ देहरादून तक नहीं बसता बल्कि असली उत्तराँचल दूर-दराज के पहाडी इलाको में बसा है , जहां बिजली की समस्या है, पानी की समस्या है, स्कूल की समस्या है, रोजगार की समस्या है, चिकित्सा सुबिधावो की समस्या है, सड़क मार्ग नहीं है, इत्यादि इत्यादि ! और जो एक समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करती जा रही है, वह है बेरोजगारी ! पहले लोग कम थे, जनसँख्या कम थी, इसलिए युवा वर्ग आसानी से सेना में भर्ती हो जाता था, अथवा मैदानों का रुख कर कही पर प्राइवेट में नौकरी कर अपना भरण पोषण कर लेता था ! लेकिन अब ज्यों-ज्यों जनसँख्या और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, भर्ती संस्थानों में भर्ष्टाचार बढ़ता जा रहा है , यह समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है, और आज सबसे बड़ी प्राथमिकता है इससे निपटना ! जिसके लिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर अधिक से अधिक रोजगार के अवसर जुटाए जाएँ !

एक लेख में हिमांचल के बारे में पढ़ रहा था कि शुरूआती दौर में किस तरह वहाँ की सरकार ने हिमांचल को एक प्रमुख फल उत्पादक राज्य बनाने में मदद की ! उसी लेख को पढ़ कर वही विचार मेरे भी दिल में अपने उत्तराखंड के लिए आया ! अभी कुछ समय पहले अपनी जन्मभूमि जाने का एक और सुअवसर प्राप्त हुआ था, यह देखकर दिल को बड़ा दुख पहुँचा कि गावं के गावं खाली पड़े है और वो सीढ़ी नुमा खेतो की कतारे बंजर होकर जंगल में तब्दील हो चुकी है ! जहाँ इसका एक प्रमुख कारण यह है कि लोग रोजी-रोटी की तालाश और मूलभूत सुविधावो के अभाव में मैदानों को पलायन कर गये, या कर रहे है, वहीँ दूसरा प्रमुख कारण यह भी है कि सरकार की उदाशीनता की वजह से स्थानीय कृषक अपने खेतो से वाँछित उत्पादन नही प्राप्त कर पाते! धन की कमी और परम्परागत खेती से ही जूझते-जूझते किसान हिम्मत हार बैठता है और मैदानों की ओर पलायन कर जाता है!

आज जबकि कहने को हम उत्तराखंडीयो का अपना अलग राज्य है , हमें चाहिए कि एक नए सिरे से उत्तराखंड आन्दोलन फिर से छेडा जाए और हर स्तर पर सरकार को इस बात के लिए मजबूर करे कि वह एक निश्चित कार्यक्रम के तहत, एक विधेयक लाकर, उन सभी कृषि योग्य वंजर पड़ी या शुष्क जमीन को अगले १० वर्षो के लिए अधिग्रहण करे ! (इस निर्धारित अवधि के बाद सरकार को वह जमीन, जमीन मालिक को वापस लौटाने का भरोसा दिलाना होगा और उके लिए पुख्ता इंतजाम भी करने होंगे, क्योंकि यह भी सत्य है कि लोग जमीन कब्जाने के लिए कानूनों का सहारा ले, नाजायज फायदा उठाने से नहीं चूकते ) !उस अधिग्रहित की हुई जमीन पर उपयुक्तता के हिसाब से फलदार वृक्ष जैसे अखरोट, नींबू , सेब इत्यादि लगाने चाहिए और अगले चार-पाँच सालो तक जब तक कि पेड फल देने लायक नही हो जाते उसकी नियमित देखभाल करने के पुख्ता इंतजाम करने चाहिए ! इसके अलावा अन्य तरह की नकदी फसलो का भी इनपर प्रयोग किया जाना चाहिए! पाँच साल बाद जब वृक्ष फल देना सुरु करे तो अगले ४-५ सालो की इन फसलो को स्वयं बेचकर सरकार उस रकम की काफ़ी हद तक भरपाई कर सकेगी जो उसने इन पर खर्च की है, साथ ही स्थानीय बेरोजगार युवा वर्ग को रोजगार भी मिलेगा ! और मैं समझता हूँ कि सरकार के पास अगर इच्छाशक्ति हो तो इस प्रकिर्या को लागु करने में कोई बहुत बड़ी दिक्कत उसके सामने आनी नही चाहिए !

किसानो को खेती के बीज की ख़राब गुणवत्ता के कारण नुकशान उठाना पड़ता है सरकार को किसानो को अच्छे बीज और खाद उपलब्ध कराने के लिए उसमें सुधार करने की आवश्यकता है, वे उचित और किफायती मूल्य पर किसानो को उनके अपने विपणन क्षेत्र में / दरवाजे पर ; गुणवत्ता के बीज, समय से और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक, सहकारी और वितरकों और डीलरों के निजी नेटवर्क के माध्यम से यह सुनिश्चित करे! साथ ही ग्राम स्तर पर किसानो की सहकारी समीतियाँ बनायी जाए और पानी के संरक्षण के लिए उचित व्यवस्था की जाये !

इस काम में मदद के लिए स्थानीय भूतपूर्ब सैनिको की एक वटालियन तैयार कर बहुत ही कम कीमत पर उनकी सेवाए ली जा सकती है ! और वे लोग भी इस नेक काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे ! अगर यह सम्भव हो पाया तो यह निश्चित है कि २०२० तक अपना उत्तराखंड एक समृद्ध राज्य होगा और देश का एक विकसित भूभाग !

Thursday, May 21, 2009

ऐजा लछुली !

छोडीक मी तै यकुली,
तू किलै गै मैत लछुली
लै-पैरीक भेज्दु त्वैतै,
तू किलै गै चादरी मा,

खाणु-पेणु सब छुटयूँ च,
त्वै बिगर यख लछुली
भूखन यख मोरी-मोरीक,
मी बैठ्यु छौ खादरी मा !

बथों ह्वै, अर् ढ़ान्डू पडी,
बरखा मा सभी बौगी गिन
गुठ्यारा मा जू रख्यां छा,
जौ सुखौणोंकु मान्द्री मा,

इकेक दाणी करी कुत्र-कुत्र,
मूसौं न वू खै यालिन
ढयाप्रा मा जू रख्यां छा,
ग्यों पिसौणोंकु जान्द्री मा !

ओबरा बिटीकी भूखन,
बांजू भैंसू भी लारांदु,
डिग्चा भी ख़मडॉण लग्यां,
कुकुर-बिरालु जाजरी मा

यख त चूची कै सी भी अब,
त्वै बिगर रयेन्दु नी च
बौडीक अब ऐजा चूची,
रंगली-पिंगली घाघरी मा !

Monday, May 18, 2009

तु नौनि छै कमालै की (कोरस गढ्वाली गीत)

नौनू:-- हे भाना, ज्वानि च उकालै की,सोला सतरा साले की
बाटु बिरडी जायि ना, तु नौनि छै कमालै की….
तु नौनि छै कमालै की… तु नौनि छै कमालै की

नौनी:-- यु बाटु सुहा ढाल कु, कुमाऊ अर गढवाल कु
उन्द रौडी जायि ना, तु नौनु छै कमाल कु….
तु नौनु छै कमाल कु…. तु नौनु छै कमाल कु

नौनू:-- मठु-मठु कै हिट चुची, मेसि-मेसि कै रख खुटी
कमरि लच्कि जालि त, हकीम बुलौला कख बटी….
हकीम बुलौला कख बिटी,..हकीम बुलौला कख बिटी

बात च य हालै की, वल्या-पल्या छालै की
बाटु बिरडी जायि ना, तु नौनि छै कमालै की….
तु नौनि छै कमालै की…तु नौनि छै कमालै की…

नौनी:-- देखि-देखि कै रख खुटा, चिफुलु च यु बाटु चुचा
खस्स रौडी जायि ना, ढुन्गौ मा यख का उच-ऊचा.
ढुन्गौ मा यख का उच-ऊचा. ढुन्गौ मा यख का उच-ऊचा

रौलु च यु पाल कु, बौण सीलु माल कु
उन्द रौडी जायि ना, तु नौनु छै कमाल कु..
तु नौनु छै कमाल कु… तु नौनु छै कमाल कु…

नौनू:-- ह्युं का ऊचा डान्डा छन, मुन्डा ऐंच घान्डा छन
यु बाटु मा जग-जगहो, किन्गोडा का कान्डा छन..
किन्गोडा का कान्डा छन… किन्गोडा का कान्डा छन

पाति काचा डालै की, तु फ़ान्कि छै ग्विरयाल की
बाटु बिरडी जायि ना तु नौनि छै कमालै की…
तु नौनि छै कमालै की.. तु नौनि छै कमालै की….

नौनी:-- होश आपणा ख्वाइ ना, तु ई उमर गवाइ ना
ज्वानि का ये रंग मा चुचा, रंग्मतु ह्वै जाइ ना…
तु रंग्मतु ह्वै जाइ ना… तु रंग्मतु ह्वै जाइ ना’

रख नाक अपण ख्वाल कु, कर काम इन धमाल कु
उन्द रौडी जायि ना, तु नौनु छै कमाल कु..
तु नौनु छै कमाल कु… तु नौनु छै कमाल कु….

नौनू:-- ज्वानि का ये धैडा मुंद, ओंश की न डाल बुन्द
भाना चुचि इ उमर मा, क्वासु यु प्राणि हुन्द..
कवासु यु प्राणि हुन्द..क्वासु यु प्राणि हुन्द

रख बात यीं जन्जाल की, तु गेडी पर रुमालै की
बाटु बिरडी जायि ना तु नौनि छै कमालै की…
तु नौनि छै कमालै की.. तु नौनि छै कमालै की.. !!

Wednesday, May 13, 2009

एक गढ़वाली गीत- तू ऐजा !

पढ़यु-लेख्युं नौनु छौ मी,
कुछ नी चैन्दु दैजा !
बस कूड़ी-भांडी खेल्ण कु,
तू मी दगडा मा ऐजा !!
लछी मी दगडा मा ऐजा ,
चूची मी दगडा मा ऐजा ,

घर कु काम मी करलू
तू फिक्र ना कर धाणी की !
नी सहेंदी पीढा मी सी,
ये तरसदा प्राणी की !!
कब तकै अकेलु रों मी ,
तू मी दगडी रैजा,
पढ़यु-लेख्युं नौनु छौ मी,
कुछ नी चैन्दु दैजा !
लछी मी दगडा मा ऐजा ,
चूची मी दगडा मा ऐजा ,

तेरी खुशी का बाना मी,
कुछ भी खालू खैरी !
बोंण-धाण मी देखलू तू,
घरमु रै लै-पैरी !!
गुड की गेंदुडी मी खालु
तू गुलगुला खैजा,
पढ़यु-लेख्युं नौनु छौ मी,
कुछ नी चैन्दु दैजा !
लछी मी दगडा मा ऐजा ,
चूची मी दगडा मा ऐजा ,

यखुली च प्राणी मेरु ,
दगडया एक चैन्दी !
ज्वानी की झौल चूची ,
सदानी इन्नी नी रैन्दी !!
भटकी गयुं ये बोंण मा
तु मी बाट्टू बतै जा,
पढ़यु-लेख्युं नौनु छौ मी,
कुछ नी चैन्दु दैजा !
बस तू कूड़ी-भांडी खेल्ण कु,
मी दगडा मा ऐजा !!
लछी मी दगडा मा ऐजा ,
चूची मी दगडा मा ऐजा

Tuesday, May 12, 2009

गढ़वाली नोक-झोंक !

नौनी:---- सूणियाली मिन तेरी चबड़-चबड़,
….चकडैत छोरा, भिन्डी ना बोल !
नौनू:-----आहा, जुबान सी कना फूल झड़ना,
…..लबरा छोरी तू गिचु ना खोल !! ,
नौनी: ----तू भिन्डी ना बोल..!.
नौनू: -----तू गिचु ना खोल..!

नौनी:---- चबड़-चबड त इन छै कर्नु
……..जन क्वी लोदगु छै चबाणी
नौनू:----- न खोल तै लबरा गिच्चा
…….कन सडी सी बास आंणि
नौनी: ----शट-अप् तू भिन्डी ना बोल
नौनू: ….. चुपकर तू गिचु ना खोल
नौनी:---- तू भिन्डी ना बोल..!.
नौनू:---- तू गिचु ना खोल..!

नौनी: ---- तेरा जना मेरा बाट्टू मा,
……अग्नै-पिछ्नै, बिजां मजनू घुम्दन
नौनू: ----- अरे तेरा जनौ तै बट्टा मा,
…… कुकुर भी नि सुन्ग्धन
नौनी:------ शट-अप् तू भिन्डी ना बोल
नौनू: ……. चुपकर तू गिचु ना खोल
नौनी: ----- तू भिन्डी ना बोल..!.
नौनू: ------ तू गिचु ना खोल..!

नौनी:------ किलै छै तू इन रिन्गुणु ,
….. क्या चांदी तू मी मुकै ?
नौनू: ----- त्वै सी मी तै कुछ नी चैन्दु,
….. तू नाजा मी सी मुख लुकै
नौनी: -----शट-अप् तू भिन्डी ना बोल
नौनू: ----- चुपकर तू गिचु ना खोल
नौनी:---- तू भिन्डी ना बोल..!.
नौनू: ----- तू गिचु ना खोल..!

Sunday, May 3, 2009

पैटौन्दि दां वा पाहडि बांद

देखी खडी बाट्टा मा, मिन वा पाह्डी बांद
गौं बिटीकि छुट्टी खैकी, ड्युटि परै आन्द,
डांडयों मा छांईकी छै, कुयेडी की धुन्द
सुहा छौ पैटण लग्युं तैंकू , जाणकु तै उन्द

पिंग्ली साडी गात परै, हर्यु स्काफ़ मुण्ड
चांदि की कर्दोड कमर, टल्खि कन्धा फुन्ड,
चम-चम चमकुदु छौ ,गला कु गुलबन्द
लट्कदी बिस्वार तैंकि, लंबी नाक मुंद

गौणौन छै स्वाणि मुख्डी, वींकि लक्दक
अथेड्ण्कु आईं छै वा, आददा बाटा तक,
आण कु बोली वै तै, फ्योर अग्ल्या ह्युंद
ढोल्न लगी आंखी छै, बडा-बडा बुन्द

पैटौन्दी सुहा देखी छै, मिन वा पाह्डी बांद
गौं बिटीकि छुट्टी खैकी, ड्युटि परै आन्द,
डांडयों मा छांई की छै, कुयेडी की धुन्द
तैंकू सुहा छौ पैटण लग्युं, जाणकु तै उन्द
-गोदियाल

Friday, May 1, 2009

जगह का महत्व और उसका हमारे स्वाभाव पर प्रभाव !

हालांकि मैं उत्तराँचल में रहा तो केवल ८-१० साल ही, मगर मेरे बचपन पर वहां की माटी की एक अमिट छाप है ! वहा की हर चीज़ को बहुत करीब से अवलोकित किया है मैंने! ऐसा ही एक इंटरेस्टिंग पहलु आपके समक्ष रख रहा हूँ ! हो सकता है की कुछ हद तक मेरा अवलोकन ग़लत भी हो, फिर भी उम्मीद है, रोचक लगेगा !

'सोइल टेस्टिंग'( मिट्टी का परीक्षण) शब्द तो आपने अक्सर सुना ही होगा! देश-विदेश में जब भी कोई बड़ा ढांचागत प्रोजेक्ट लॉन्च किया जाता है तो पहला काम होता है, सोइल टेस्टिंग रिपोर्ट ! एक ज़माना था जब हमारे गाँवों में, कोई मकान के लिए जमीन खरीदता था तो खरीदने से पहले उस जगह की थोडी सी माटी गाव के स्पेसिअलिस्ट ( वाक्या) के पास ले जाता था, जो सूंघ कर बताता था कि जमीन उसके लिए उपयोगी है अथवा नही ! इसी तरह के कुछ भिन्न भिन्न पहाडी जगहों से सम्बंधित रोचक तथ्य यहाँ रख रहा हूँ !

वैसे तो जब आप किसी मैदानी क्षेत्र के व्यक्ति से पहाडी लोगो के बारे में उसके खयालात जानो तो वो यही कहता है कि पहाडी लोग, ख़ासकर उत्तराखंड और हिमाचल के इमानदार , शरीफ और अच्छे नेचर के होते है ! मगर सभी जानते है कि भिन्न भिन्न तरह के इंसानों की सोच, उनके हाव-भाव, उनके चेहरे की बनावट और मुखमुद्रा भिन्न भिन्न होती है ! कभी सोचा की ऐसा क्यो होता है ? इंसान के इन हाव-भावों को कौन प्रभावित करता है ! बहुत से फैक्टर इसमे काम करते है, और जिनमे से एक है जमीनी फैक्टर ! तो मैं इसी जमीनी फैक्टर की बात पहाडो खासकर उत्तराँचल के सम्बन्ध में आपके समक्ष रख रहा हूँ !
जमीनी संरचना .........वहाँ के निवासी का औसत स्वाभाव

सूखी पहाडी चोटी पर रहे वाला ..........................चिडचिडा और अप्रिय बोलना
हरित पहाडी चोटी पर रहने वाला ........................ गुस्सैल मगर मीठा बोलना
बर्फीली चोटी ...................................... भावहीन चेहरा
सूखी घाटी.........................................चिडचिडा मगर डरपोक
हरित घाटी........................................ गुस्सैल मगर बहादुर
सिंचित भूमि वाली घाटी ...............................हंसमुख चेहरा, मीठा बोलने वाला
घाटी के बीच का मैदान.( जैस.देहरादून )................... मतलबी और मीठा बोलने वाला
(कहाँ आपकी जेब कटी,आपको पता ही न चले)
पहाडी के आगे का उष्म कटिबंधीय क्षेत्र ( जैसे भाबर,तराई )...... प्लेन मगर तल्खी बोलने वाला

अब आप सोचो आप इसमे से किस जगह के निवासी है और आपका स्वभाव मेरे उपरोक्त चार्ट से मेल खाता है अथवा नही !

Friday, April 24, 2009

बोडी की छबीस जनबरी !

२९ दिसम्बर, १९९५, वै टैम परैं श्रीनगर बिटिकी दिल्ली तक की उत्तरप्रदेश रोडवेज की सीधी बस सेवा छै।  तब मेरु नौनु तीन सालौ कु छौ, ये वास्ता तबारी हम तैं स्कूल-उस्कूल कु क्वी झंझट नी छौ।   परिवार तैं हरिद्वार अपना रिश्तेदारुका पास छोडिकी, मैं एक दिन का वास्ता श्रीनगर गै छौं। लौट्दी दा मैन हरिद्वार तकौ तै सुबेर छै बजी वाली श्रीनगर-दिल्ली वाली रोडवेज की बस पकड़ी छै।  सात बजी का करीब गाडी देवप्रयाग का धोरा पौछि।   मैं कंडक्टर का बगल वाली सीट मा ही बैठ्युं छौ। जख्मु बिटिकी एक सड़क हिंदोलाखाल कु तै कटदी वख वै मोड़ परैं अचानक ड्राइवरन ब्रेक लगैन।   कंडक्टरन दरवाजू खोली त भैर बिटिकी एक साठ-पैसठ साल की वृद्धा एक कुट्यारु जनु थैलू पकडीक खड़ी छै, और फिर वीन पूछी; "बबा या गाडी दिल्ली होली जाणी" कंडक्टर का बोलण सी पैली मिन जबाब दिनी " हाँ बोड़ी जी , या दिल्ली वाली बस च, आपन कख जाण? " बोड़ीन इत्गा सूणी  अर वांका बाद फटाफट गाडी का भीतर औणकु तै अप्णि लाठी और खुट्टी अगनै सीड्यो मा बढ़ेंन और बोली क़ि बबा मैन दिल्ली जाण! गाडी मा चौडिकी वा बोड़ी मेरी पिछ्नै वाली सीट मा बैठीगे।  

गाडी अग्ने बढ़ी, और फिर एक-डेड घंटा का बाद व्यासी पौंछंण पर वखमु चा-पाणी पेण का वास्ता रुकिगे।  लगभग सब्बी  सवारी भैर उतरिगैन, मैं भी अपणी सीट मकै भैर उतर्न का वास्ता खडू होंयु और मैन पूछि; 
"बोड़ीजी आपन भी पेण चा-पाणी कुछ ?" 
बोड़ी:  न बबा मैं तै उल्टी होंदी !
मैं ई सूणिक तै मन ही मन हैरान छौं कि वा बोड़ी अकेला दिल्ली छै जाणी, ये वास्ता मेरा भीतर काफी कौतुहल छौ।  अत:  मैन फिर पूछी; 
"बोड़ी दिल्ली कै काम सी छा जाणा आप ?
बोड़ी: बाबा मेरु नौनु रंदु तख, मैं छबीसजनबरी देखणाकु तै छौ जाणू।  मैनाग रालू नौना मु अर् छबीसजनबरी देखीग घौर एई जालु। 
कै जगा रंदन आपका लड़का दिल्ली मा बोड़ी ? मैन फ्योर पूछी।
बोड़ी: जादा पता त मैं नी मालूम बबा, पर इन छौ नौनु बोल्णु कि वू विनोद नगर मा रन्दू।  
आप पैली भी रए कभी दिल्ली मा ? मैन फ्योर पूछी।
बोड़ी: न बबा, पैली दा ही छौ जाणू।  
आपन अपना नौना तैंत बतै याली होलू कि आप वख दिल्ली छा औंणा, ताकि उ वख बस अड्डा पर राला अयाँ, आपतै लेणकु ? 
बोड़ी: कुजाणी बबा, लेंणकु तै औंदु कि नि औंदु, पिछली दा जबारी छुट्टी ए छौ तबारी बोली छौ तैन कि माँ, इबारी दा त्वै दगडी क्वी दगडू होलू त छबीसजनबरी देखण कु दिल्ली ऐ जे।  अब दगडू त मैतै क्वी मिली नी इ वास्ता आफी लग्युं बाट्टा, अब जू भी होलू दिक्खे जालु, वैगु पता धार्यु च मेरु आफुमु, कै तै पूछि-जांचिकि पौंछी जालु।  

बोड़ी की इत्गा बात सुणण छै मिन कि मेरा पूरा शरीर मा एक कंपकपी सी दौडिगे।  अकेला कन मा जाली या बूढीड़ दिल्ली मा, मैं यूँ ख्यालू मा ही डुव्युं छौ कि तबारी बोड़ीन पूछि " बाबा तू कख रैंदी, तिन कख तक जाण ?
बोड़ी रैंदु त मैं भी दिल्ली छौं पर.....(बोडीन मेरी बात काटिकि बोली) हे बाबा,  फिरत मी तै भी दगडू हवैगी... मिन नोट करी कि बोड़ी की मुखडी पर एक चमक सी एगी छै।  मिन बोली, बोड़ी आपन मेरी पूरी बात नी सूंणी, मैंन भी जाण त दिल्ली च पर अभ्भि सीधू नी छौं मी वख जाणु।   मेरा अपना बच्चा छन छोड्या हरिद्वार रिश्तेदारुका पास।  ऊन ताख अभी एक हफ्ता रुकण, वांगा बाद औला हम दिल्ली।   मेरी बात सुणण का बाद बोड़ी कु चेहरा फिर मुर्झैगी छौ ! मेरु दिमाग भी तेजी सी दौडंण लग्यु छौ कि ईं बुढ़िडयो क्या किये जौ ? बोड़ी तै आफु दग्ड़ी  एक हफ्ता का वास्ता हरिद्वार ही रुकै देन्दु और जब हम जौला तब बढ़डी तै भी दगडा मा लिजैकि  बुढडी तै वींगा नौना मु छोडीक तै ए जाला।   परन्तु फ्यौर ख्य़ाल आई कि एक त मेरा बच्चा भी रिश्तादारुका यख छन और दगडा मा मैं यी बुढडी तै भी हफ्ता रोजकू तै वख ली जालु त वू लोग क्या सोचला।   

फिर मै बोडी तै सम्झ्हौण लग्यु कि बोडी आप इन अकेला न जा दिल्ली, वख अच्छा खासा लोग धोखा खै जान्दन, बिरिडी जान्दन, त आप त जनाना जात छा, आप यक्खी मु बिटीक घौर लौटि जा, मै बिठै देलु आपतै देप्रयागै गाडी मा।  बोडी: न बबा, मेरी त इबारीदा धारणा धारींच कि मैन छबीसजन्बरी देखीक ही औण।   अब मिन घौर बिटी अपरु लाठु-छतुरु उठै ही यालि त अब जु भी होलु, जाण दी ,फुन्ड फूक…!

मै बोडी दग्डी यु छुंयों मा ही रैग्यु और गाडि फिर चल्ण लगी छै ! मै सम्झीगि छौ कि बोडी तै सम्झौण कु क्वी फैदा नी च ! पर मेरा भितर एक उथल-पुथल सी मचीं छै, बार-बार कभी हरिद्वार सी दिल्ली तकौ पूरु रस्ता मेरी आखों मा ऐ जान्दु छौ, त कबारि दिल्ली कु आईएसबीटी वालु बस अड्डा, कभी दिल्ली की सड्कु कु ट्रेफिक, त कभी दिल्ली का लोग ! मैन आपरु मुन्ड घुमाइकि तै पूरि गाडी की सवारियो कु मुऐना करी, मेरि नजर कै इना आदमी तै ढूडणी छै, जु विस्वासपात्र हो और बोडी तै दिल्ली मा कुछ मदद कर सकु ! हरिद्वार उतर्न सी पैली मैन अपना दिल की तसल्ली का वास्ता द्वी इना लोग ढूँढली छा , जौन दिल्ली जाण छौ अर् आईएसबीटी उतर्न छौ ! मैन वू द्वी लोगु सी विनती कारीग तै यु पक्कू करियाली छौ की वू बोड़ी तै बस अड्डा का भैर बिटिकी ऑटो माँ बिठालीक तै ऑटो वाला तै ढंग सी सम्झै दये की वू बोड़ी तै वींगा नौना गा पता पर घर तक छोडू ! फिर मैन बोड़ी कु परिचय, वू द्वी लोगु सी करै और बोड़ी तै समझौण का बाद हरिद्वार उतरीग्यु !

एक हफ्ता हरिद्वार रुकण का बाद मैं दिल्ली आई ग्यों ! मेरा बच्चा एक हफ्ता और का वास्ता हरिद्वार ही रुकिगी छा, किलायिकि रेश्तेदारून जोर करी कि अगल्य हफ्ता वू लोगुन भी दिल्ली आण, एक व्यो मा शामिल होंण कु, ये वास्ता मेरा बच्चा भी वू दगडी मा आला! वू दिनु मै लक्ष्मीनगर मा विजय चौक पर किराया का मकान पर रंदु छायो! मैन हरिद्वार बिटीकी सुबेर की बस पकडी छाई ये वास्ता मै करीब एक बजी अपणा क्वाटर पर पौन्छिगी छौ ! मै मकान की दुसरी मंजिल पर रंदु छायु ,जख मा आधा छत पर द्वी कमरा किचन कु सेट छौ और आधा छत खाली छाई ! ठंडीयों का दिन और सफ़र की थकान होंण का वजह सी मै थोड़ी देर का वास्ता कमरा पर रजाई ओढिकी सेइ गयु ! अभी मै तै लेट्या थोडा ही देर ह्वै छाई कि अचानक छत मा लोगु की आवाज सुणीक मै उठी गयु ! भैर ऐकतै देखि त तैल्या माला पर रण वाला मकान मालिक का सभी बाल-बच्चा छत मा खडू ह्वैक, नीस विजय चौक पर लगी भीड़ कु तमासु देखणा छा! मैन भैर छत मा ऐकि तै मकान मालिकै बडा नौने की ब्वारि तै पूछि, क्या हुआ भाभी जी क्यो लगी है ये भीड ? उन जबाब दिनि, अरे वो नीचे चौक पे साडीयो की दुकान के आगे पता नही कहां से आकर, पांच-छै दिन से एक पागल टाइप की पहाडी बुढिया बैठी हुई थी, जो भी औटो वाला अन्दर गली मे आता था, वह उस पर जो भी उसके हाथ लगता था, फेंककर मारती थी ! अभी-अभी ये बच्चे बता रहे है कि उसे कोई मोटर साइकिल वाला टक्कर मारकर भाग गया ! ’एक पागल टाइप की पहाडी बुढिया’ वीं भाभी का वू शब्द मेरा कानो मा बजण लग्या छैया ! मैन बिना देरि करयां अपणा चप्पल पैरिन और बेड चौक पर पौंछि ग्यु ! भीड का घेरा का भीतर घुसीक मैन जु देखी त मेरा होश गुम ह्वैगैन ! सफ़ेद कुर्सयां बाल, मुख पर बिखर्या छा, भिन्डी दिन बिटीक भुखी-प्यासी, बिना न्हेयां-धुयेयां सडक का किनारा पर बेहोश पडी वा बोडी सचमुच कै पागल जनि ही दिखेण लगी छै ! मैन द्वी तीन लोग, जु मेरा अगनै खडा छा, वू अपना द्वी हाथुन एकितिरफ़ा करीन और बोडी का एकदम पास जैक तै घुन्डो का बल बैठीक अपना हाथ सी बोडी कु चेहरा हिलायि और जोर सी बोली.. बोडी.. बोडी… मगर बोडी पर क्वी सान-बाच नी छै ! मैन इथै-वुथै नजर दौडाइ, कुछ दूरी पर एक पाणी ठेलि वालु खडु छौ, मै दौडी वै मु गयु और एक गिलास पाणिकु लीक वापस बोडी का पास आयूं ! मैन पाणि का छींटा बोडी का मुख पर मारिन, पर क्वी फैदा नी ह्वाइ ! मैन बोडी की नश देखी त नस की धड्कन भी डुबी छाइ, लोग अगल-बगल खडु ह्वैक तमाशु देख्ण पर लग्यां छा ! तभी भीड मा बिटीकि एक दाना-सयाणा आदिमिन बोली ! बुड्डी है,नब्ज से नही चलेगा धड्कन का पता, छाती पे कान लगाकर चेक करो ! मैन उन्नि करि, बोडी की धड्कन च्लण लगि छै !

मैन पास ही खडा एक युवक सी बोली , भाई साहब, वो आगे नुक्कड पर रिक्शा खडा है जरा बुला लावोगे, उसको बोलना कि वालिया नर्सिंग होम तक चलना है ! वू लड्का दौडीक तै रिक्शा बुलेक लाइ, मिन बोडी अप्णा द्वी हाथुन उठाई और रिक्शा मा धारीक तै वै तै फटाफ़ट वालिया नर्सिंग होम चलण बोली ! टैम पर मिल्यां उपचार सी बोडी दुसरा दिन होश मा ऐगी छै ! डाक्टरन एक दिन और बोडी तै ऐडमिट रख्ण की सलाह दिनि ! जब बोडी ढंग सी होश मा ऐगी छाइ, तब मी तै अपण पास देखिकी बोडी का चेहरा पर थोडा रौनक ऐगी छै, जब मैन पूछि कि बोडि कन च अब तबियत ? वीन पूछी, बबा तु वी छै न, जु मी तै गाडि मा मिलि छायो ! मिन जबाब दिनि, हां बोडी मी वी छौ !
बोडी: मेरा बाबा, वै दिन मै तेरि बात माणि याल्दु त…. बोडी रोण लगी छै…. मैन बोडी तै धीरज बन्धै और सम्झै कि अब मै ऐ ग्यु, अब चिन्ता न कर…..!
बोडी: बबा, बिजा निठुर च या दिल्ली त, कै पर जरा भी दया-धर्म नी ! मै छै-सात दिन बिटीकि भूखु-प्यासु रयुं पर कैन एक गिलास पणियो कु भी नि दिनि……. ! बोडी का आखुं मा बिटी आसुं तरपर-तरपर झणण लयां छा !



मिन पूछी, बोडी जौ द्वी लोगु मा मैन गाडि मा बात करि छै, वून क्वी मदद नी करि ?
बोडी: बेटा, वून मी बस अड्डा बीटिकि आटु मा बिठै त यालि छौ पर वै औटु वालन धोखा दिनि बबा, दिल्ली पौंछ्दु-पौछ्दु रात हव्गि छै, वैन मै मु का जथा पैसा छा, लुट्यारु-कुट्यारु छौ, नौना कु पता छौ, उ कमीना सब लीगी बबा और मै तै चौराहा पर धोलिगे, बोडी फिर रोण लगी छै ! अब मेरी समझ मा सारि कहानी ऐगि छै कि किलै बोडी, औटो वालौ पर ढुन्गा फेक्दी छै ! मैन बोडी तै फिर ढाढस बन्धै कि बोडी अब तु बिल्कुल भी चिन्ता न कर, मै छौ त्वै दग्डी मा, मी त्वै घौर तक छोडीक आलु ! बोडीन फिर आंसु टप्कैन, मेरु मुन्ड मलासी और चुप रै, बोली कुछ नी !

शुक्र छौ भग्वानौ कि बोडी पर सिर्फ़ गुम चोट ही लगि छायि , हड्गी-मुड्गी सलामत छै ! नर्सिंग होम बिटीक डिस्चार्ज करीक तै मै बोडी तै अप्णा क्वाटर पर लायु त मकान मालिकुन पूछि, आप इनको जानते हो ? मैन बोली, हाँ, ये मेरी मां है, मुझे ढूढ्ते हुए यहां आई थी मगर मै दिल्ली से बाहर गया हुआ था, इसलिये वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठी ! मेरि बात सुणीक वू लोग हक्का-बक्का ह्वैगी छा ! अब बोडी मेरा पिछ्नै लगी छै बर्ड-बर्ड करण कि बबा मेरा नौना कु अता-पता त अब मै मु छौ नी, पर तु ढून्डी सक्लु वै तै ? मिन बोडी तै सम्झै कि बोडी तू मेरा घर पर आराम सी बैठ, दिल्ली मा बिना पता कु या फिर टेलीफोन नम्बर का ढूढ्ण आसान काम नी, फिर भी मी कोशिश करलु ! वांगा बाद मी एक दिन शाम कु विनोद नगर गयु, कुछ लोग पूछी भी छन कि यख क्वी मनोज नाम कु पहाडी लड़का रंदु ? पर उतना बड़ा विनोदनगर मा यु काम इतनु आसान नी छयो ! बोडी का मेरा कमरा पर औण का द्वी दिन बाद हरिद्वार बिटीकी मेरा बच्चा भी एगी छा ! फिर मिन अप्णि घौरवाली दगडी मा बात करी कि ये शानिबारकू मैं बोडी तै वींगा गौ छोडीक एतवारकू वापस दिल्ली ऐई जालू ! मेरी घरवालीन मी सम्झायु कि यार या बोडी इतनी धारणा धारीक तै, इतना रिस्क लीक तै २६ जनवरी देखण कु आई छाई, त अब दस दिन बाद २६ जनवरी औंण लगी, ये वास्ता कम सी कम बोडी तै अब २६ जनबरी दिखैकी ही वापस भेजला! मैं तै भी अप्णि घरवाली की बात उचित लगी और फिर बोडी तै मनैकी तै, बोडी भी माणि गे !

इंडिया गेट पर छबीस जनबरी देखीकी तै बोडी भौत खुस छै, मानो चार धाम घूमिकी आई गे होली, वखि बीटिकी हम बोड़ी तै लक्ष्मीनारायण मंदिर भी लीगी छा ! वांका बाद मी तै, मेरे घरवाली तै और बच्चा तै वींन कई बार आशीर्वाद दिनी ! फिर एक दिन शनिबार सुबेर, मैं बोडी लीक वींगा गौ निकल पडयु! बोडी का गौ पौछुदु-पौछुदु हम तै रात पडी छाई ! अग्ल्या दिन सुबेर जब मैं वापस दिल्ली औंण कु पैट्यु त बोडी आखों मा आंसू लीक, मेरु थैलू पकडीक डेली पर खड़ी छै ! मैंन बोडी का चरण छुईंन त बोडी मी तै अप्णा सीना सी लगैक फिर रोंण लगी छै ! मिन जाणि- बूझिकी ध्यान बाटंण का वास्ता बोली, बोडी, मेरु झोला इथा गरु किले च लग्णु, आपन क्या भौरी यख पर? बोडी न मेरु मुंड मलासीक बोली, कुछ नी बाबा, मै क्या दी सकदु त्वाई तै ? मैंन बोली, आपकू आशीर्वाद ही हमारा वास्ता काफी च, और फिर मैं निकल पडयु वख बटीक ! बोडी काफी दूर तक भैर छाजा मा बिटीक मी तै जांदू देखणी राइ !

दिल्ली पौन्छिकी जब मेरी घरवालीन मेरु बैग खोली, त मेरा आँखा नम ह्वैगी छा देखीग तै, बोडीन भी उन्नी कुट्यारी बांधीक छै रखी बैग परै, जन कभी दिल्ली औंदी दा, मी तै मेरी माँ देंदी छै बांधीक तै ! डब्बा पर एक माणि घी की, एक कूटयारी पर गौथ, एक्का पर झंग्र्याल और थोडा सा जख्या...................... !




















Monday, April 20, 2009

थोडा मेरि भी सोच

ये कलयुग मा ब्वै-बुबा ही ग्रेट छन त नौनौंगी त बात ही कुछ और च, जब बात हद सी अगनै बढ जान्दि त नौनु अप्ण बुबा तै क्य सलाह देन्दु ल्या सुणा;

पापी ज्यू पर लागि बबा, ज्वानि की खरोच
ब्योगा दिन औण लग्या, थोडा मेरि भी सोच
बानु तु बणौ न बबा, कि खुटटा पर च मोच
उठौ अपणु लाठु छतरु, थोडा मेरि भी सोच

ई भरीं ज्वानि मा भि मी, कब तकै लुकारि ताडु
देखि-देखि की लोगु सणि, कबरी तक टर्कणि गाडु
कैगु क्वी अणबिवायुं रैगि हो, गौंमा इनि क्वि मौ च
उठौ अपणु लाठु छतरु ,अर थोडा मेरि भी सोच

दोण दैजु लीक तै, ये घर मा भी ब्वारि आलि
जन मी पल्येणु छौ, तन स्या भी पल्येइ जालि
मी सी भी छोटा-छोटो कु, अग्ल्या मैना ब्यो च
उठौ अपणु लाठु छतरु अर, थोडा मेरि भी सोच

त्वै सी नि ह्वै सक्दु कुछ त, सुण ली मेरि बात
मैन आफि उठैकि लौण, ज्वी भि लग्लि हाथ
फिर न बोलि नाक कटेगि, दुश्मन सारु गौं च
उठौ अपणु लाठु छतरु अर, थोडा मेरि भी सोच
पापी ज्यु पर लागि बबा, ज्वानि की खरोच
ब्योगा दिन औण लग्या, थोडा मेरि भी सोच

-पी.सी.गोदियाल

Wednesday, April 8, 2009

हे ! तुमुन कबारी क्यैगा आरसा चुरैन ?

जब मैं छौ अपरी उम्र कु भौत नादान
तब रंदु छौ बण्यु गौ कु गबरू पदान
लुकारी खोल्यो मा चडीक, खादरा परै
चोरी-चोरिक खाएं मिन आरसा सदान

कभी येगा, त् कभी वैगा खादरा बीटी
टक रंदी छाई लोगु का ही खादरौ पर
आरसु छौ मेरु एक प्यारु मिठू भोजन
टपैकी ली जन्दुछौ,जब देखि क्वी नी घर

तुम होला सोचणा कि फसक च मारनु
येन भला आरसा कख बीटी खैन ?
लुकारी खोल्यो मा चडी त् गैलु पर
खादरा पर आरसा कख बीटी ऐन ?

गौ मा जब क्वी ब्यो होंदा छा या
ब्वारी आंदी छाई क्वी मैत बिटीक
घौर-घौर मा सबुका पैणु बटेन्दू छौ
जू ब्वारी लांदी छै मैत बिटी लीक

हे!तुमुन कबारी क्यैगा आरसा चुरैन ?
मिन त् यार,बचपन मा भौत खैन
याद आंदी बिजां,याद त् याद ही राण
अब हमुन अरसा त् कख बिटी खाण ?

-godiyal

Sunday, April 5, 2009

लघु गढ़वाली रूपक- 'देशी ब्वारी'

पात्र:
महेशानंद - साठ बर्षीय बुजुर्ग
विशाम्बरी - महेशानंद की पचपन वर्षीय पत्नी
राकेश - महेशानंद और विशाम्बरी का २८ वर्षीय जेष्ट पुत्र
लक्ष्मी - २४ वर्षीय राकेश की बहु ,जेष्ठ पुत्र बधु
अन्य पात्र: दिनेश- २५ वर्षीय द्वितीय पुत्र
दिनेश की बहु-२२ बर्षीय पुत्र बधु
( महेशानंद जी छाजा मा बैठीक हुक्का पेंण लग्या छन और कुछ सोच मा भी पड्या छन, इतना मा भैर चौक मा विशाम्बरी आन्दि)


विशाम्बरी: (ऊँचा स्वर मा कणान्दी और बोल्दी) हे मेरी बोई.... उहू..... मरग्यु मी त..... बजर पडेंन मास्द्वी यी गवाडी मूंदे, सुबेर बिटिकी काम करदू-करदू हड्गा- मुड्गा दुखण लगिन मेरा त ! "काम कु नौ नी च अर् प्राणी कु थौ नी च", पता नी विधातन मेरी यी खोपड़ी मा क्य लेखी, सदानी इनी खैरी खैन मिन त ! कैन सुद्दी थोडी नी खायी उ औखाणु; "हल भी लायी, फल भी पायी, पर सुखदेव जीन कभी सुख नी पायी" !


महेशानंद: हा-हा-हा-ह,... खफ-खफ...हुक्का चिल्म का कस लेते हुए, …किले छे राकेश कि ब्वै आफी-आफ मा बरणाण लगी, तिन बरडै-बरडै कि पागल ह्वै जाण, मिन बोलियाली !




विशाम्बरी: ( गुस्सा मा ) हां-हाँ, होण दया, तुम्तै भारी च फिकर...




महेशानंद: अरे राकेश कि ब्वै, सुण त सै, तुत जरा-जरा सी बात पर गुस्सा ह्वै जांदी...!


विशाम्बरी: बस-बस, आज तक भौत सुणियाली मिन तुमारी, अब नी सुण सक्दू, सुणि सुणिक मेरा कंदूड फुटि गैन !


महेशानंद: (गुस्सा ह्वैक) ओ हो , राकेश कि ब्वै, तुत मेरी बात सुणीक इन उच्हड़न लग जांदी जन कवी चौबाटा पर कालिंक्या उच्हड़दी, पता नि क्य जोग्लौर आन्दि त्वै परै..... पूरी बात कभी नी सुणण !


विशाम्बरी: बोलियाली न, नि सुणि सक्दू , आज तकै मिन सूणी त च, कुछ तुमारी सुणी, कुछ तुमारा लड़ीक,ब्वारिकी ! (गुस्सा दिखौन्दी और बोल्दी) तुमारा आँखा त अभी गरुडून गाडी नि छन, तुम भी देखणागै होला कि क्य च मेरी फंजोडा फंजोड़ी होंणी ! या उमर च अब मेरी काम करनैगी, है ? दिनेशै ब्वारी स्या सुबेर लीक चलिगी छै बौण, घास का बाना परै, अब औली व्यखिनी दा मजा मा हाथ हिलौन्दी, ततुरु दिन काटदी वा तै बौण, अर् स्याम वक्त द्वी पूली घासै मुंड मा धारीक ऐ जांदी मटकी-मटकीग, शरम भी नी औंदी कुत्ति तै ! जै पर बितदी, वै तै ही पता चल्दु !




महेशानंद: ओ हो त क्य करन मिन, किले छै तू मेरा पिछ्नै हाथ ध्वैगी पड़ीं, साफ़ साफ़ किले नि बोल्दी !


विशाम्बरी: क्य करन तुमुन, मजा मा हुक्का प्या और टांगडा पसारिक बैठ्या रा, और कर भी क्य सक्दै तुम ! बिजां फरकैली तुमुन आज तकै....! ( फिर जोर सी बोल्दी ) कम सी कम इथा त होश होंदी कि छोटा नौना कु ब्यो पैली करियालि, अर् बड़ा लड़ीकै गी क्वी पूछ नी...... उ स्यु सुधि च लटगुणु दिल्ली फुंड ! कतना शर्मै की बात च, लोग दू क्य होला बोलणा ! तुम त इन छा सोचणा जन बुले लोग आफी लान्दन आपरी नौनी तै तुमारा मोर पर धार्नौकु तै ! पिछ्नै बीटी सी चार मसाण और ह्वैगिनी खडा, बिवोंण लैख ! कम सी कम ब्योड़ दुकानी मा त जांदा, सी च दूकान छोरो का भरोषा परै छोड्डी, पतानी क्य छन वार-पार करन लग्या वू!




महेशानंद: इन बोल्दु यार त,तेरा बोल्नौगु मतलब या च कि राकेश कु ब्यो करा!


विशाम्बरी: और नतरै सुदी छौ तुम दगडी दिमाग पचिस्सी करणु, एक ब्वारी और यै जाली त थोडा त काम कु बोझ हल्कू होलू , यी छन बुडेन्दी दा मेरा हड्गा-मुडगा चुरेणा, और कुछ नि ह्वै सक्लू वी सी त, कम सी कम खाणौं त देली पकैगि तै !




महेशानंद: हा-हा-हा,..... अच्छा त तू इ छै सोच्णी कि अगर हाकि ब्वारी भी ऐ जाली त सौब काम तब ब्वारी ही करली और तू भी मजा मा टांगडा पसारी बैठ जाली ! कुजाणी बुढडी... कुजाणी-कुजाणी... यांगा भिन्डी सास न रा, आज्कलै पढ़ी-लेखीं नौनी क्वी काम नी कर्दीन, वू त तेरा धन भाग, जू दिनेशै ब्वारी त्वै सणी काम-काजी मिलिग्याई, तू छै सोच्णी सभी तनी ह्वालि ! तू भी रैगी सदानी जंगली गी जंगली...!


विशाम्बरी: हाँ-हाँ मैं त जंगली छौ, तुम त छा मन्खी, भारी घुमायु तुमुन मै बम्बै, कलकता...!


महेशानंद: हे बुडड़ी! झूट न बोली वा, बुडेन्दी दा कीडा पडला, अगर झूट बोलली त...! तता साल घुमाई मिन तू दिल्ली मुन्दै, वू ठीकि बोलि कैन कि 'बार मॉस दिल्ली रै, अर् भाडै झोकी'...!
विशाम्बरी:(गुस्सा मा ऐन्च छजा मा ऐक तै, महेशानन्द का बगल परै बैठीक तै ) बस, तुम मा त व्योगि छ्यो गाडि अर, लग्या तुम मी सैणि लेक्चर सुणोण, कुछ कर्यन-धर्य्न ना !


महेशानन्द: ओ हो, त नी आन्दि बुडीड रस्ता परै, अच्छा त सुण मेरि बात, हमारु नौनु सोलां पढयू च, ये वास्ता, वै तै ब्वारि भि कम सी कम बारह्वीं’ पढीं त खोज्णै पड्ली….


विशाम्बरी: हे मेरी ब्वै, बारां पढी…,तब त करियालि वीन काम काज, भै ज्यादा सी ज्यादा पाच-सात पढी खोजा दू, जरा चिट्ठी-पत्री लेखण-पढ्ण आयि चैन्दी बस, भारि जाण वीन बारां पढीक प्रधान मन्त्री बण्णौ कु त्तै,


महेशानन्द: भै तन्त त्वि जाण, छै-सात पढी दग्डी मा राकेश ब्यो करण तैयार होन्दु भि च कि ना….!


विशाम्बरी: किलै नि कर्लु, मी आफ़ि त सम्झौन्दु वै तै,


महेशानन्द: (परेशान ह्वैक्तै) ओ हो त तु नी छै माण्न्या मेरी बात,चला आज-भोल नौनु भी घौर आण वलु च , वै औन दी, तब वै पूछीक ही ढून्ड्ला नौनि !


( थोडि देर मा नीस खोली कु दरवाजु बज्दु)


महेशानन्द: कुच भै ?


आगन्तुक: मै हू पिताजी, राकेश !


महेशानन्द: (विशाम्बरी तै ) हे बुढडी ! कि छै खुट्टा पसारी बैठी, खडु उठ, नौनु ऐगि दिल्ली बिटिन, चा, पाणि बणौ वै तै..!


राकेश: नमस्ते पिता जी !


महेशानन्द: चिरंजीव बेटा, ठीक छै, औ बैठ, क्य हाल छन दिल्ली फुन्डैगा ?


राकेश: क्या हाल होने है पिताजी, आजकल वहां सडी गर्मी पड रही है बस….उह…..अफ़ ( अपना रुमाल सी चेहरा पर हवा करदु )…. यहा तो फिर भी ठीक-ठाक मौसम है !
(इतना मा विशाम्बरी भितर बिटीक पांण्यों गिलास लान्दि)


राकेश: नमस्ते मांजी !


विशाम्बरी: ( पांण्यों गिलास वै तै पक्डैग तै ) चिरंजीव बेटा ! खुब छै, कथा लम्बि उमर च मेरा बेटै की, आब्बी, हम द्वी बूढ-बुड्या तेरै बारा मा छा बात करना…!


राकेश: मेरे बारे मे क्या बात कर रहे थे मां आप लोग ?


विशाम्बरी: तेरा ब्योगि बात बेटा, तेरा ब्योगि बात छां हम करण लग्यां, बोल दू, पांच-सात पढी नौनि ठीक रालि, भिन्डी पढी-लेखिं लैग भी क्य कर्न, थोडा काम-काज वाली….


राकेश: (बीच मा ही खडु उठ जान्दु और बोल्दु) पांच- सात पढी का मैने अचार डालना है क्या ? पहले तो बी ए हो, नही तो कम से कम इन्टर पास तो होनी ही चाहिये…..(बैग उठैक भितर अपणा कमरा चलि जान्दु)




महेशानन्द: ( विशाम्बरी सी) सुणि यालि तिन, सीधु बी ए च खुजौणु…. ( तोतलु गिचु बणैक ) जाण्दि छै, बी ए कथा तै बोल्दन ? उतनिदा त खुब छै अपरा गिच्चा पर पोलिस लघ्हाणी कि मै आफि सम्झौन्दु अप्णा लडीक तै, अब क्य ह्वै ? वा औखाण च न कि “ मेरु नौनु दोण नी सौकुदु, बीस पथा सौक्याल्दु”… भलो…भलो, तेरै बोल्यां पर मैन कखि बात पक्की नी करि , अभि गला-गला ऐ जान्दि हमारा !


विशाम्बरी: उह ….! करा भै त अब जु कुछ करदै, मिन क्या बोल्ण, पालि-सैन्तीकि, पढै-लिखैकि आखिरि मा इनि लगौन्दन यि जुत्ते पटाक, पाला बल यु तै…!
(अगला दिन सुबेर मु )


महेशानन्द: (विशाम्बरी सी)चल्दु छौ भै मै, जरा मेरु लाठु-छ्तुरु लौ दु बल,
(कुछ देर बाद राकेश भैर आन्दु)


राकेश: मां, पिताजी चले गये, क्या कहा पिताजी ने ?


विशाम्बरी: वून क्य बोल्ण, चलिगिन तब देख दू कखि लग जौ सैदा-भैदा…. आस पास त कखी इथा पढी-लेखि नौनि छौ भी नीन…
(महेशानन्द कु प्रवेश)


महेशानन्द: हे मेरि बोइ, बिजां गरम च होणु आज त, एक गिलास पाणि लौ दु बुढ्दी….


विशाम्बरी: ल्या इच….. जल्दि ऐग्या लौटीक, लगि च कखि…….!


महेशानन्द: हां, तेरै मैत का धोरा च एक नौनि, तेरहा मा पढ्नी च , भैर देश रन्दी, अपणा बै-बुबा दग्डी… आज कल सभि घौर छन आयांका गर्मियो की छुटियों मा ! पर एक बात च भै, चाल-चलण नौनि कु बिल्कुल देश्यों जनु च, काम का नौ परै उल्टु भान्डु सुल्टु नी करदी वा…साफ़ साफ़ बतैलि वींगा बै-बुबन ( राकेश की तरफ़ मुडीक तै ) तेरु क्य बिचार च बेटा ?


राकेश: अगर लड्की वाले तैयार है तो ठीक है पिताजी, मेरे साथ उसको भी दिल्ली के ऐड्वांस कल्चर मे रहना है ! ( भितर चली जान्दु)


विशाम्बरी: (महेशानन्द सी) अच्छा त इन करा कि अगर जल्म्पत्री जुड जान्दि त जब्र्यु नौनु छुट्टि पर यख च और वु लोग भी घौर मु छन, फटा-फट ब्यो भी करि दया


महेशानन्द: ठीक च, मै भी जल्दी निपटौणै गी छौ सोच्णु !


(और तब कुछ टैम का बाद ब्यो भी ह्वै जान्दु, महेशानन्द जी लोण मन्त्र भी जाण्दन, जौं लोगु का गोरु-भैसा ढंग सी दूध नी देन्दन वू महेशानन्द जी मु लोण मन्त्रौण कु आन्दन, ये वास्ता घौर मा लोग-बाग औणा, जाणा रन्दन )


इन्नि एक आगन्तुक: पंडाजी पैलोक !


महेशानन्द: आशिर्वाद महाराज !, आवा बैठा,


आगन्तुक: और सुणा, बाल-बच्चा, कुटुम परिवार सब ठीक ठाक छन, मैन सूणि आपन नौना ब्यो करि हालै मा, नौना ब्वारि कख छन्न ?


महेशानन्द; हां, खडेलिन मास्त, तखि होला भितर फुन्ड जनान्यों दग्डी मा कखी लट्कणा !


आगन्तुक: हे बाबा ! ततरी बात किलै छा बोल्णां, ल्या दु जरा ये लोण तै मन्त्र दयान, बिजां दिन बिटीकि कट-पट च कर्ण लग्यु लम्डौण्यां भैंसु.


(महेशानन्द जी लोण की पूडि क भितर धार्यु एक रुप्या सिक्का कीसा मुन्द धार्दन और लोण मन्त्र्दन)


महेशनन्द: ऒम नमो महादेव साकुर जी तुम को नमस्कारा, धरती माता कुर्म देवता तुम को नमस्कारा, रान्ड को हुन्कार फुन्कार, मर्द को जैकार, ऐला सीता कौन्ति दुर्पदा तुम को नम्स्कारा, (गिच्चा भितर धीरा सी) जो या भैंसी अगर दूध होलि देणी त दूध नि दयान, ब्याण्कु होलि त द्वी थ्वैडा ह्वान ! वांका बाद अपरी मुठ्ठी बौटीक व पर जोर सी फूक मार्दन, और फिर आगन्तुक सी, ल्या ये लोण तै भैंसा तै द्वी दा सुबेर – शाम चटै दयान !
(आगन्तुक का जाण का बाद विशाम्बरी औन्दि)


विशाम्बरी: हे मेरि बै उह ! छी भै, बजर पडेन ये जमाना मुन्दै, बोल्ण कु तै द्वी ब्वारी छन, अर् मेरा यु हाल छन, ऊ भग्यान सी छन मजा मा भितर पड्या का, लोच्डी ऐगि हो जन बुले !


महेशानन्द: (मंद-मंद हंसते हुए) पैली छै बूढ गिताड कि अब नात्ती दु ह्वैगी ! मैन त पैली बोलि यालि छौ कि इना सास कतै न रा कि हाकि ब्वारि का आण पर तु राज माता बणि जालि, अरे बुढ्डी किलै रन्दी त्वै तै इथा सगर-डगर होणी, तु भि चुप बैठ जा दू , हम द्वी झणौ तै पेन्शन ही काफ़ि च, यि मास्द, कर कमै सक्ला त खै लेला, नतरै आफि बजौंदन मुरली !


विशाम्बरी: ऊ भग्यान जब बजौला, तब बजौला मुरली, पर हमारी मुरली त सी आभि बिटीकि बज्ण लैगि, क्य पै मैन युं मास्दु तै पाली-सैन्तीक, सी छ्न बिल्कुल अंग्रेज बण्या, अंग्रेजि मा छन तौन्कि बात चल्णीं, पता नी क्य बुरैं छन हमारि करन लग्या ? ऊ छन सोचणा, यीत बोलिक्तै पढ्या-लिख्या नीन, यून क्य सम्झण की हम क्य छा बोल्णा, पर मै त सौब सम्झ्णु छौ ! ( तबर्यो भितर बीटी राकेश की ब्वारि आवाज लगौन्दि)


लक्ष्मी: मांजी टू कप टी
विशाम्बरी: (महेशानन्द की तरफ़ मुडीक तै) सुणियाली तुमुन क्य च तुमारी देशी ब्वारि मी क तै बोल्णी ?


महेशानन्द: ( अटपटा मन सी)


विशाम्बरी( गुस्सा मा उंची आवाज निकाली तै), हू, जन बुले तुमुन नी सुणी, भै मी तै च बोल्णी कि तू खब्ती छै बल !


महेशानन्द: (हुक्का गुड्गुडाते हुए ) भै, बुढ्डी फुन्ड फूक, अब बोलण दी ऊ तै अब जु कुछ बोल्दन, अब क्य कर सक्दा हम ? जुंओ गा बानौ घाघरू त नी छोड सक्दा न ! आपर्वी सिक्का खोट निकल जौ त क्वी क्य कर सक्दु ?


विशाम्बरी: हां, बोल्ण दया, नतरै मी वीकु गिच्चु छौ बुज्डू, जै बौ गु बल बडु भरोशू छौ, स्ये दिदा-दिदा बोलण लगी ! (ये बीच मा लक्ष्मी दुबारा आवाज लगौन्दी)


लक्ष्मी: मांजी , पिलीज टू कप टी


विशाम्बरी: (गुस्सा मा जोर सी) हे बेटी ! पलीत तेरि ब्वै होलि, जैन तु पैदा करी, अर खब्ती ऊ होला मास्द जौन तु यख विवाइ या यी होल जु इनि भद्रा तै यख लैन !
(लक्ष्मी भैर औन्दि पिछ्नै-पिछ्नै राकेश भी दग्डा मा औन्दु)
लक्ष्मी: (गुस्सा मा) मांजी व्हट नोन्सेन्स,टाक सिन्सीबली


विशाम्बरी: क्या ? क्य बोलि तिन, ह्ट नौनु छैंच, अर तु टांग खैंच देलि, ली जरा खैंची दिखौ, छै अपणा बुबै त ! अर अब पालि-सैन्तिकी ये नौनन त्वै दग्डि मिलिगि तै हमारी टांगै त खिच्ण, हे मास्द, शरम कर !


लक्ष्मी: अरे मांजी, तुम तो मेरी हर बात का उल्टा ही अर्थ निकालती हो, मैने तो आपसे सिर्फ़ दो कप चाय बनाने को ही कहा था, खैर, मै खुद बना लेती हू !
(फिर थोडी देर मा किचन बिटीकि आवाज लगौन्दि, अरे मांजी ! स्टोव जल रहा है , चावल कुक्कर मे डाल दू क्या ? (ये कुक्कर और स्टोव तै वा ब्यो मा दैजा लै छै)


विशाम्बरी: हां, शाबास ! चौलु तै कुकुरु मु डाल दी, और तुम तब थौकुली बजान, भै चौल यू मास्दू तै फीर्यन जु इनि लक्ष्मी यख लैन , ( जोर सी) मैन त बोल्लि छौ, देशि ब्वारि नि ल्हवा… नि ल्हवा……!
(पर्दा गिर जाता है )
_पी.सी. गोदियाल
नोट: यह लघु रूपक मैने ११ मई, १९८२ को किसी खास वजह से लिखा था, तब मैं बारहवी का छात्र था !

Thursday, January 29, 2009

द भै, ब्वारी क्य बोन तब !


मींकु  ब्वारी ढूँढी मेरा बुबन,         
इनी ळंबटांग्या स्वोणी ,                   
जन क्वी झंगोरा का बीच कौणी ,
अर् बांदुरु का बीच  ग़ोणी !


तडतडी च नाक व्वींकी,
जन  दाथ्डै  की चोंच होंदी,
अर् चौंठी पर तिल च इनु.
जन क्वी मोटी कौंच होंदी !


हैंस्दी मुखडी व्वींकी इन दिखेंदी,
जन्बुले हो रोंणी,
मीं कू ब्वारी ढूँढी मेरा बुबन,
इनी ळंबटांग्या  स्वोणी  !


बोल्दी दा इन छुट्दन तैन्का,
गिच्चा बिटिक बोल,
मंडाण मा कखी बजणु हो,
जन क्वी फुट्यु ढोल !


जब देखा स्य धारा  परै,
मुख् ही रन्दि धोणी,
मीं कू ब्वारी ढूँढी मेरा बुबन,
इनी ळंबटांग्या  स्वोणी  !


सेडी सुर्म्याऴी आंखी रंदीन,
गीत क्वी सुणाणी,
देखदी दां कन  रै बबा तेरी,
खोपडी स्या खजाणी !


जन तव्वा कु थौरु होन्दु,
इनी  तैंकी हाथि -गौणी,
मीं कू ब्वारी ढूँढी मेरा बुबन,
इनी ळंबटांग्या  स्वोणी  !


Note: 
विद ड्यू रेस्पेक्ट,  सर्वप्रथम तो यह कहूंगा कि आप इसे किसी के उपहास के तौर पर बिलकुल भी न लें, यह कविता सिर्फ मैंने हास्य-विनोद  और मनोरंजन के लिए लिखी है , इससे किसी के मन पर अगर कोई ठेस पहुचे तो उसके लिए भी अग्रिम क्षमा ! कविता का सार यह है कि बेटा अपने पिताजी को कोसते हुए कह रहा है कि पता नहीं मेरे बापू की क्या खोपड़ी खुजला रही थी जो इस लम्बे टांगो वाली हसीना(ळंबटांग्या स्वॉणी ) को मेरे लिए ढूंढा !

-गोदियाल

Wednesday, January 21, 2009

दो शब्द !

My Grand  Maa late Swaree Devi
बंधू ! बस यूँ समझिये कि लेखन के प्रति लगाव या यु कहूँ कि एक जूनून बचपन से था ! आज उम्र के इस मुकाम पर पहुँच कर अफ़सोस यही रहता है कि मैं अपने लेखन को संजो कर नही रख सका ! लिखता था, दो चार दिन पढता था और फिर फाड़ कर फ़ेंक देता था ! कहीं कोई डायरी लिखी भी तो पिता फौज में थे, हर दुसरे -तीसरे साल बदली हो जाती थी कभी अरुणांचल तो कभी जामनगर, कभी केरला तो कभी श्रीनगर ! और इस अदला बदली में बहुत कुछ छूट जाता था, जो कॉफी किताब या डायरिया होती वो वहीँ छूट जाती ! नवी- दसवी गाँव के स्कूल से की थी ! रात को जब लोग चैन की नींद सो रहे होते थे तो मैं लैंप ( लम्पू ) के आगे लिख रहा होता था ! उस समय की लिखी एक छोटी सी पहाडी कविता की कुछ पंक्तिया याद आ रही है , इन्हे ग़लत तरीके से मत लेना ! भले ही यह हास्यास्पद हो, लेकिन एक बाल्यकलाकार ने जो कुछ देखा, उसका चित्रण किया :

कविता का शीर्षक था " धत्त तेरे पहाडी की "

ऩ्हॆण-धुयेण नी मैनो तक,
थेग्लों पर बास आँदी इन ,
जन लुव्हे की कड़ये पर आंदी, 
बासी कोदा का बाड़ी की !
धत्त तेरे पहाडी की !

नाक मूंद सिंगाणा का धारा, 
गिचा मूंद बौग्दु ऴाळु,
सलवार कु नाडू त् 
संभाल नि सकदु,
अर बात करदू खाड़ी की !
धत्त तेरे पाहडी की !!

दिनभर हुक्का फुकुण,
काम कि दां कोणा लुकूण,
उलटू भांडू सुलटु कै नी सकण,
अर बतीसी दिखौंण
गिच्चू फाड़ी की, 
क्य तारीफ़ करू त्व्ये अनाडी की !
धत्त तेरे पाहडी की !!

कलात्मक गुण तो हर इंसान के अन्दर होता है, जरुरत होती है, उसे बाहर लाने के लिए एक सुद्र्ड प्रेरणा की ! हमारे अपने बड़े-बुजुर्गो से पहाड़ के अनेक कवियों के बारे में सुना और इसी से आगे कुछ लिखने की प्रेरणा मिली ! बहुत पहले ऐंसे ही एक कवि थे, और शायद आप भी उनसे परिचित होंगे ! वो थे, महंत योगेन्द्र पुरी ; अपने बड़े बुजुर्गो से उनकी कविता के चर्चे सुने , कुछ पंक्तियाँ याद है जरा आप भी पढिये:

जिंदगी कु दिन एक आलू 
वारंट दीकी यम् त्वे बुलालू 
जल्दी त्वे सणी वख जाण होलू 
सामल भी साथ नि लिझाण होलू 
कुडी व पुंगडि, धन, माल, माया, 
नौना-जनाना छन जौंका प्यारा
धर्यु ढकायुं सब छूटी जालू 
वारंट दीकी जब यम् त्वे बुलालू.............................................!

सोचिये, कितनी गूढ़ बातें कही हैं कवि ने !!
धन्यवाद
गोदियाल
मेरा यानी गोदियाल वंश का शुरूआती इतिहास !सोलह्वी सदी के आस-पास उत्तरांचल मे, खासकर समूचे गढ्वाल क्षेत्र के ब्राह्मणो मे अपनी उपजाति(सरनेम) के साथ ’याल’ अथवा ’वाल’ जोड्ने की प्रथा काफ़ी प्रचलित थी! जिस उपजाति के साथ ’याल’ जुडा होता था, जैसे नौटियाल, थपलियाल, गोदियाल,सेमवाल, जुयाल,पोखरियाल,सुन्दरियाल,बौठ्याल इत्यादि , तो परिचय देते वक्त सुनने वाला सहज यह अन्दाजा लगा लेता था कि परिचयदाता ब्राह्मण जाति का है ! पन्द्रहवी-सोलह्वी सदी का वक्त काफ़ी धार्मिक उथल-पुथल वाला माना जाता है ! पहाडो मे हिन्दू धर्म को मानने वाले मुख्यत: तीन वर्गो अथवा जातियो मे बंटे थे; ब्राहमण, क्षत्रिय और शुद्र ! इन अलग-अलग वर्गो और जाति के लोगो ने स्थान, देश और ऐतिहासिक्ता के आधार पर अपनी अलग-अलग उपजातिया बनाई !

गोदियाल वंश का उदय सन १५५० और १६०० ई० के मध्य हुआ माना जाता है, जब नौटियाल उप-जाति का एक ब्राहमण परिवार, कर्ण-प्रयाग से करीब पचास किलोमीटर आगे, गढ्वाल और कुमाऊ की सीमाओं के मध्य स्थित नौटी गांव से निकलकर, अनेक दुर्गम पहाडियों को पार करता हुआ, फतेह्पुर, बरसौडी (राठ शेत्र) होता हुआ, वर्तमान पौडी जिले के गोदा नामक गांव मे पहुचा और वही जाकर बस गया ! तत्पश्चात गांव के नाम के आधार पर अपनी उपजाति ’नौटियाल’ से बदल कर ’गोदियाल’ रख ली, और फिर यहां से इस गोदियाल वंश का उदय हुआ ! अबका तो खैर ज्यादा मालूम नही, किन्तु पुराने वक्त में यही वजह थी कि नौटीयालो और गोदियालो के बीच शादी के रिश्ते नहीं होते थे ! उस समय इस गोदा गांव के आस-पास पांच-सात कन्डारी उपजाति के क्षत्रिय परिवार रहते थे, आस-पास कोई और ब्राह्मण परिवार न होने की वजह से उन्होने इस ब्राह्मण परिवार को अपना राज-गुरु बना लिया ! और तभी से यह प्रथा शायद आज तक चली आ रही है !

समय बीतने पर इस परिवार ने भी बढ्ना शुरु किया और अठ्ठारवीं सदी तक पहुंचते-पहुंचते एक भरे पूरे गांव की शक्ल मे परिवर्तित हो गया ! फिर जैसा कि अमूमन होता है, परिवार मे लोगो के बढ्ने और रोजी-रोटी के साधनो के सिमट्ने से भाईयो और सगे-सम्बंधियो मे आपस मे कटुता बढ्ने लगी और धीरे-धीरे गोदियाल परिवार यहां से भी बिखरना शुरु हुआ ! यह बात मै अपने तजुर्बे के आधार पर लिख रहा हूं कि शायद तभी से यह अभिशाप(मै तो इसे अभिशाप ही कहुंगा) इस गोदियाल जाति के साथ चला आ रहा है कि हालांकि इस जाति के लोगो ने हर स्तर पर सराह्नीय प्रगति की, मगर कहीं भी ये लोग दो , अधिक से अधिक तीन पीढियो से ज्यादा एक स्थान पर नही टिक पाये, और अब तो आलम यह है कि एक पीढी से आगे ये लोग एक जगह स्थिर नही रह पा रहे हैं !

अठ्ठारवीं सदी के शुरुआत मे जब लोग इस गोदा गांव से निकले तो बिखरते चले गये ! कुछ परिवारो ने पहाडो मे ही अन्य स्थानो पर अपने ठिकाने तलाशे तो कुछ मैदानी इलाको जैसे देहरादून, चन्डीगढ, बिजनौर तथा दक्षिण मे आन्ध्रा प्रदेश, कर्नाटका के हुबली-धारवाड़ तथा गोवा की ओर प्रस्थान कर गये ! मैदान की ओर गये कुछ परिवारो ने गोदियाल उपजाति का परित्याग कर अपनी नई उपजाति शर्मा रख ली ! कुछ लोग जो आन्ध्रा प्रदेश, कर्नाटका तथा गोवा मे बसे थे, उन्होने अपनी उपजाति तो गोदियाल ही रहने दी, मगर धर्म बदलकर मुसलमान बन गये, मसलन इस्माइल गोदियाल, अमानुल्ला गोदियाल, सलमा गोदियाल, अताउल्ला गोदियाल ,परवेज गोदियाल, इत्यादि ! इनमे से कुछ मुस्लिम परिवार बंगलौर मे भी बसे है !
(इससे आगे का हिस्सा सुरक्षा कारणों से हटा दिया गया है और यदि इसमें किसी भी सज्जन का अपना आगे कोई ऐतिहासिक लिंक नजर आता है तो कृपया उसकी डिटेल मुझे इ-मेल करे, अथवा मेरे नीचे दिए गए ब्लॉग पर भी आप अपनी प्रतिक्रिया छोड़ सकते है ! मैं उसके आगे की जानकारी जितनी मेरे पास उपलब्ध है, आप लोगो को दूंगा ! मैं आपको विस्वास दिलाता हूँ की सभी सूचनाये गोपनीय रखी जायेंगी ! साथ ही आप लोगो से प्रार्थना करुंगा कि यदि आपको इस वंशीय इतिहास की कोई और ठोस जानकारी हो( चाहे वह छोटी सी जानकारी ही क्यो न हो), तो कृपया मुझे मेल करे, मै इसके लिये आपका आभारी रहुंगा, और आप से यह भी निवेदन करुंगा कि इसमे जहां कही पर आपको अपने बंश के उल्लेख की कडी मिले उससे आगे का अपना इतिहास स्वयं लिखे और उसमे अपनी वर्तमान पीढी के नामो का उल्लेख करें, तथा वर्तमान और आने वाली पीढियों को भी इसे आगे लिखते रहने के लिए प्रेरित करे ! यह बंशीय परिचय मैने किसी दुराग्रह से ग्रसित होकर नही लिखा, फिर भी यदि भूल से किसी बात का कोई अधूरा या गलत उल्लेख हो गया हो तो उसके लिये क्षमा प्रार्थी हूं !)
धन्यवाद !
आपका,

My Grand Parents late Mr. & Mrs. Jaya Nand Godiyal

'मिन त गीत पुराणु ही गाण' !

सुणिई त ह्वालि तुमारी,  व औखाण,
'कि आदू कु स्वाद, बल बांदर क्य जाण',
तुमितै मुबारक हो या भौ-भौ 
अर् ढीकचिक-ढीकचिक,
भै, मिन त गीत पुराणु ही गाँण !

बैण्ड परैं  नाचदा यी रमपम बोल,
दाना-स्याणौं  कु उड़ान्दा मखौल,
छोडियाली यून अब ढोल-दमाऊ,
मुसिकबाजु,शिणे त कैन बजाण,
पर मिन त गीत पुराणु ही गाण !

अबका नौन्यालू कि इखारी रौड़,
बाबै  मोणी मा फैशन की दौड़,
यी क्य जाणा मुण्ड मा टोपली
अर् कन्धा मुंद छातू लिजाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

पढोंण का खातिर यूँ तै भेजि स्कूल,
अददा बट्टा बिटिकी ये ह्वैग्या  गुल,
घुम्या-फिरया यी कौथिक दिनभर
दगडा मा लिकी क्वि गैला-दगडीयाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

मुसेडै की डौर अर पैंसों  कि तैस,
चुल्लू उजड़ीगे और ऐगिनी गैस,
यी क्य जाणु कन होंदी बांज कि लाखडि
अर् व्यान्सरी मु फूक मारी  गोंसू जगाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

काटण छोडिक लाखडु अर् घास,
खेलण लग्यां छन तम्बोला तास,
घर मु गौडी-भैंसी चैन्दि लैंदी सदानी,
अर बांजी गौडी-भैंसी कख फरकाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

पेण कु चैन्दि यु तै अंग्रेजी रोज,
बै-बुबगी कमाई मा यी करना मौज,
जब कभी नि मिलू यु तै अग्रेजी त्
देशी ठर्रा न ही यूँन काम चलाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

खाणौ मा बर्गर-पीजा और चौमिन-दोशा,
नि मिली कभी त बै-बुबौऊ तै कोशा,
हेरी नि सकदा यु कोदा झंगोरू तै,
कफली अर् फाणु त यून कख बीटी खाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

बदन पर युंका लत्ती न कपडि और,
वासिंग मशीन भी यी लैग्या घौर,
इनी राला घुमणा नांगा पत्डागा त
आख़िर मा ठनडन पोट्गी भकाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

फैशन मुंद युंका इनु पड़ी विजोक,
कमर युंका इन जन क्वि सुकीं जोंक,
डाईटिंग कु युंकू इन रालू मिजाज
त डाक्टर मु जल्दी यूं पड़लू लिजाण
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !

भिन्डी क्य बोलू आप दगडी यांमा मैं,
आप भी पढ़या-लिख्या और समझदार छै,
सुधर्ला त अच्छी बात नि सुधर्ला त
बूडेन्द्दी दा तुमन ही आपरी खोपडी खुजाण,
भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !


Friday, January 2, 2009

आर्थिक जागरूकता और उत्तराखंड !

यह लेख मैंने करीब एक साल पहले उत्तरांचल की साईट पर लिखा था और अपने भाई बन्धुवों के लिए अपने Blog पर अब पोस्ट कर रहा हूँ !

This was a piece of News around March,2008
Buffett 'becomes world's richest'

US investment guru Warren Buffett has ousted his friend and occasional bridge partner Bill Gates as the world's richest man, Forbes magazine says. The Microsoft co-founder had topped the Forbes business magazine's rich-list for the past 13 years.
Mr Buffett's wealth increased by $10bn (£5bn) last year to $62bn.
Mr Gates's fortune climbed by $2bn during the same period, dragging him down to third on the list with a fortune of $58bn.
He was narrowly pipped into second place by the Mexican communications magnate Carlos Slim Helu, whose $60bn net worth has doubled in the past two years, Forbes reports
FORBES TOP 10 (in $bn) Warren Buffett (US): 62 Carlos Slim (Mexico): 60 Bill Gates (US): 58 Lakshmi Mittal (India): 45 Mukesh Ambani (India): 43 Anil Ambani (India): 42 Ingvar Kamprad (Sweden): 31 KP Singh (US): 30 Oleg Deripaska (Russia): 28 Karl Albrecht (Germany): 27
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxदोस्तो ! यह बात आप और मैं अच्छी तरह से जानते है कि हमारे उत्तरांचल की अर्थव्य्व्स्ता आज भी एक मनीआर्डर आधारित अर्थ व्यवस्था है ! मुल्क का ६० फिश्दी युवा या यो कहिये पुरूष वर्ग या तो आर्मी में या फ़िर पुलिश में है ! सीमित साधनों के चलते हम लोग एक निश्चित सीमा से बाहर देखने को भी राजी नही ! हमे यह नही भूलना चाहिए कि भारत में जो आर्थिक विकास की धूम पिछले २-३ सालो में थी /है, वह युवा पीढ़ी की वजह से है, भारत की अपार कुशल और आत्मविश्वास से भरी युवा शक्ति जो न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही हैउसके पास कमी है तो बस आत्मविश्वास की! सबसे बड़ी बाधा यही है कि हम हर काम का शॉर्टकट खोजने लगते हैं ! शिक्षा, काबिलियत और स्वास्थ्य प्रबंधन के बिना उतरांचल की युवा जनता आर्थिक और सामाजिक तौर पर देश के लिए सहायक साबित होने की बजाये बोझ बन सकती है ! हमे ऊर्जा के इस्तेमाल, जल प्रबंधन और जनता को जागरूक बनाने में सहयोग देना होगा ! हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तरांचल और जम्मू-कश्मीर में विकास की दर भारत की औसत विकास दर से कम है ! हमारे देश के पास अमरीका के बाद सबसे अधिक इंजिनीयर, डॉक्टर और विशेषज्ञ हैं ! दूसरी तरफ़, भारत में आज भी 26 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं! एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार 31 करोड़ लोग अपने ऊपर प्रतिदिन बीस रुपए भी ख़र्च नहीं कर पाते ! लगभग आधी आबादी को साफ़ पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ नसीब नहीं हैं. जनविकास तालिका में भारत आज भी 126वें पायदान पर है!फिलहाल हमारी विकास दर चीन के बाद सबसे अधिक है, लेकिन गाँवों से पलायन का दौर तो अब भी जारी है ! यह कैसा विकास है, जहाँ गाँवों में आज भी बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं ! बेशक, भारत मे प्रतिभा की कोई कमी नहीं है ! आँकड़े कहते है कि भारत मे विकास भी हो रहा है! पर सच ये है कि उसकी अब तक की सफ़लता मे खुद से ज़्यादा दूसरों की भागीदारी रही है ! भारत को अपनी तकनीकी विकसित करनी चाहिए ताकि वह दूसरों पर आश्रित न रहे. तभी भारत महाशक्ति बन सकता है ! भारत की सबसे बड़ी ताकत है प्रचुर प्राकृतिक संसाधन,पर्याप्त श्रम शक्ति एवं बौद्धिक योग्यता, सबसे बड़ी कमज़ोरी है उचित प्रशासनिक प्रबंधन एवं नियंत्रण की योग्यता का अभाव, इसके अलावा स्वार्थ की तुच्छ राजनीति में आमजन का सहयोग भी बड़ी बाधा है !
यह तो हुई प्रस्तावना या यो कहिये भाषण बाजी ! अब रुख करते है दूसरी और, कि कैसे हम अपने उत्तरांचल की अर्थ व्यवस्था को सुधार सकते है, लोगो का रहन-सहन उपर ला सकते है ! अब मैं एक सवाल करूँगा, क्या आपने कभी शेयर बाज़ार में निवेश किया है? शेयरबजार करोड़पति भी बना सकता है और रोडपति भी जैसा की अभी हम देख रहे है ! जिसकी सोच इसमें नहीं है और धीरज भी नहीं है और आर्थिकता भी नहीं है, उसे यह नहीं करना चाहिए ! हां यदि घुश्ना ही है तो शेयर बाज़ार में दाखिल होने से पहले उसे अच्छी तरह से समझ लिया जाए तो काम थोड़ा आसान हो जाता है! शेयर बाज़ार कभी भी उन लोगों के लिए नहीं रहा जो चंद दिनों में अमीर होना चाहते है. पिछले कुछ दिनों में आई तेज़ी से लोगो ने समझा कि ये पैसा दूगुना करने का एक आसान रास्ता है. लेकिन इस मंदी ने उनके अरमानों पे पानी फ़ेर दिया. अब यही लोग पैसा निकालने को बेताब हैं. ख़ैर ये गिरावट अस्थाई है. धैर्य रखें. यह व्यवसाय का ही एक हिस्सा है ! यदि आप मुनाफ़ा की सोच रहे हैं तो घाटा उठाने के लिए भी तैयार रहिएभारतीय शेयर बाज़ार दीर्घकालीन निवेशकों के लिए बहुत मज़बूत है. इसका असर तो कम समय के लिए निवेश करने वालों पर पड़ेगा. यह जो हुआ इसकी तो पहले से ही अपेक्षा की जा रही थी और आने वाले समय में यह एक और मील का पत्थर साबित होगा.

सफलता बहुत से कारकों पर निर्भर करती है. हर कोई विदेश जाकर पैसे कमाना चाहता है और कमाता भी है लेकिन अपना सब कुछ ताक पर रखकर, अपनी आत्मा को मारकर, अपने उसूलों से हटकर, अपने परिवार से दूर रहकर पैसे तो कमा लेता है लेकिन अपने सपनों को फिर भी पूरा नही कर पाता !

हमारा लक्ष्य है "एक सुद्रिड और सक्षम उत्तराखंड" और मैं समझता हूँ कि आर्थिक एवं सामजिक क्रांति के बिना हम विकसित उत्तराखंड और एक विकसित राष्ट्र नहीं बन सकते !
इसकी कोई गारंटी नहीं कि आपकी सभी अपेक्षाएँ पूरी हो जाएं लेकिन कुछ नहीं से कुछ सही.अगर अपने देश में हम ( उत्तराखंडी) भी अन्य प्रांतो के समृद्ध नागरिको के साथ कदम से कदम मिला कर चलना सीख ले तो निश्चित रूप से हम भी बहुत आगे पहुच जायेंगे ! अगर उत्तराखंड समृद्ध होगा , यहा कि प्रतिभा क्यो मैदानों कि ओर रूख करेगी ? मगर अफ्शोश के साथ यह कहना पड़ता है कि उत्तराखंड के लोग इस और इतने जागरूक नही है ! एक फौजी जब रिटायर्ड होकर घर आता है तो अपने सारे जीवन कि खून पसीने की कमाई से या तो गाँव में एक मकान बनाता है या फिर एक महेन्द्रा की जीप लेकर लोकल रूट पर डाल देता है ! परिणाम क्या निकलता है, इससे आप सभी वाकिफ होंगे ! आज अगर आप देखे तो पावोगे कि देश का पश्चमी और दक्षिण भारत अन्य पर्देशो कि तुलना में काफी आगे बढ गए है ! कारण, वहा के लोगो में आर्थिक जागरूकता ! हमे अपनी आर्थिक प्रगति के सभी अवसरों को ठीक से तलाशना होगा और उन पर अमल करना होगा ! ऐसा ही एक अवसर है अपने धन का स्मार्ट निवेश ! आए देखे यह स्मार्ट निवेश है क्या बला !
जैसा कि मैंने सुरु में आज कि ताज़ा ख़बर का एक हिस्सा कट एंड पेस्ट किया " वारेन बफेट " ! क्या था यह इंसान - अमेरिका का एक मामूली सा निवेशक ! लकिन उसने अपनी पूंजी को सही तरीके से इन्वेस्ट किया और आज दुनिया का सबसे अमीर इंसान बन गया !

मैं समझता हू कि कम से कम अगले ५-६ सालो तक देश के पास इतने आर्थिक अवसर है कि भारत कि अर्थ व्यवस्था के लिए अमेरिका कि तरह Stegnant (रुकाव) कि कोई समशया नही है ! अतः अपने सीमित साधनों से हम उत्तरांचली जो कुछ भी पूंजी बचाते है उसे इश तरह से इन्वेस्ट करे कि हमे उसकी अच्छी रिटर्न मिले ! और ऐंशी सुरक्षित और उन्नत रिटर्न पाने का एक तरीका है , मुचुअल फंड में निवेश !

आये देखे क्या है यह मुचुअल फंड और केंसे करे इस में निवेश:
मुचुअल फंड में निवेशक अपनी रकम किसी मुचुअल फंड को थमा देता है, जिसके विशेषज्ञ ( FUND MANAGERS) अपनी समझ के हिसाब से निवेश करते हैं और फिर उसके लाभ या हानि के परिणाम निवेशकों के बीच बांटते हैं। पर यह समझना का कि मुचुअल फंड के विशेषज्ञ हमेशा ही ठीक कदम उठाते हैं, गलत है। तमाम निवेश विश्लेषण गलत हो जाते हैं, तो इन फंडों के रिजल्ट भी खराब आ सकते हैं। अतः यह भी दिमाग में रखे कि इश्मे हमे एक सीमित मात्रा में जोखिम उठाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए !
अब ऐसे मुचुअल फंड उपलब्ध हैं, जिनका शेयर बाजार में कारोबार होता है, यानी जिन्हे शेयर की तरह खरीदा-बेचा जा सकता है। एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ईटीएफ इसी तरह के फंडों की श्रेणी में आते हैं। किन कंपनियों में निवेश किया जाये, यह निर्णय अगर मुचुअल फंड के मैनेजरों के पास छोड़ दिया जाये, तो हो सकता है कि उनके निर्णय गलत हो जायें।
इस स्थिति से निपटने के लिए एक और ईजाद की गयी है-ये है इंडैक्स आधारित फंड की। इस तरह के फंड में मुचुअल फंड मैनेजरों के पास यह छूट नहीं होती कि वे जिस कंपनी में चाहें, निवेश कर लें, उन्हे उन्ही कंपनियों में निवेश करना होता है, जो कंपनियां संबंधित इंडैक्स में शामिल होती हैं। जैसे अगर कोई मुचुअल फंड सेनसेक्स आधारित फंड चला रही है, तो उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह सेनसेक्स की तीस कंपनियों में ही निवेश करें। मोटे तौर पर कहें तो इंडैक्स आधारित फंडों में फंड के मैनेजरों की अक्लमंदी पर कुछ नहीं छोडा जाता, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे चुनिंदा इंडैक्स को फालो करें। यानी इंडैक्स फंड में मुचुअल फंडों के लिए करने के कुछ खास नहीं रह जाता है। शोध वगैरह करने की जरुरत नहीं होती। सीधे तौर पर इंडैक्स वाली कंपनियों में निवेश करके के अपने दायित्व पूरे कर सकते हैं। यानी इंडैक्स आधारित फंड में खर्च भी कम आता है।
इंडैक्स फंड अभी भारत में बहुत पापुलर नहीं हुए हैं। पर अमेरिका में इनकी खासी लोकप्रियता है।
आंकड़े ये बताते हैं कि सूरमा से सूरमा मुचुअल फंड मैनेजर इंडैक्स को लगातार नहीं पीट पाते। इसका मतलब यह हुआ कि अगर तीस कंपनियों पर आधारित सेनसेक्स एक साल में पचास प्रतिशत बढता है, तो बहुत कम मुचुअल फंड होंगे, जिन्होने पचास प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न दिया होगा। यानी बहुत कम मुचुअल फंड सेनसेक्स को पीट पा रहे हैं। ऐसी सूरत में सीधे सेनसेक्स में निवेश कम जोखिम वाला माना जा सकता है।
मुंबई शेयर बाजार की सेनसेक्स के अलावा भारतीय शेयर बाजार में और भी इंडैक्स हैं। नेशनल स्टाक एक्सचेंज का पचास शेयरों पर आधारित सूचकांक निफ्टी है। अपेक्षाकृत कम बड़ी कंपनियों पर आधारित सूचकांक निफ्टी जूनियर है। बैंकिंग शेयरों पर आधारित सूचकांक बैंकेक्स है। आटो कंपनियों के शेयरों पर आधारित सूचकांक आटो इंडैक्स है।
भारत में ये इंडैक्स फंड उपलब्ध हैं-
बैंकिंग बीस, बिरला इंडैक्स, केनेरा निफ्टी इंडैक्स, फ्रेंकलिन इंडिया इंडैक्स बीएसई इंडैक्स, फ्रेंकलिन इंडिया इंडैक्स एनएसई निफ्टी, एचडीएफसी इंडैक्स निफ्टी, एचडीएफसी इंडैक्स सेनसेक्स, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल इंडैक्स, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल स्पाइस, एलआईसीएमएफ इंडैक्स निफ्टी, एलआईसीएमएफ सेनसेक्स, मैग्नम इंडैक्स, प्रिंसिपल इंडैक्स, रिलायंस इंडैक्स निफ्टी, रिलायंस इंडैक्स सेनसेक्स, टाटा इंडैक्स निफ्टी ए, टाटा इंडैक्स सेनसेक्स ए, यूटीआई मास्टर इंडैक्स, यूटीआई सुंदर।
इनमें से ज्यादातर इंडैक्स आधारित मुचुअल फंड मुंबई शेयर बाजार के तीस कंपनियों वाले सेनसेक्स या नेशनल स्टाक एक्सचेंज के पचास कंपनियों वाले इंडैक्स निफ्टी पर आधारित हैं।
जैसे-जैसे भारत में निवेशकों की जानकारी बढ़ेगी, वैसे-वैसे ये फंड ज्यादा पापुलर होंगे। दीर्घकालीन निवेशकों के लिए ये फंड बेहद जोरदार प्रतिफल देने वाले साबित होते हैं। जैसे अगर तीन साल में सेनसेक्स दोगुनी हो गयी, तो निवेशकों का निवेश भी अपने आप दोगुना हो जायेगा।

उदाहरण के लिए एक ईटीएफ है-जूनियरबीस। यानी इसमें निवेश का मतलब है कि एक साथ देश की पचास कंपनियों में निवेश। बेंचमार्क मुचुअल फंड द्वारा शुरु की गयी इस योजना के तहत निवेश उन पचास कंपनियों में ही किया जाता है जो नेशनल स्टाक एक्सचेंज की जूनियर निफ्टी इंडैक्स का हिस्सा हैं। जूनियर निफ्टी इंडैक्स मूलत उन पचास कंपनियों को समाहित करती है, जो अभी देश की बडी कंपनियों में तो शामिल नहीं हैं, पर जो तेजी से विकसित हो रही हैं। इनकी विकास की रफ्तार खासी तेज है। और इसमें किया गया निवेश दीर्घकाल यानी पांच से सात साल बाद बहुत बढिया प्रतिफल दे सकता है।
निवेशक नेशनल स्टाक एक्सचेंज से जूनियरबीस का शेयर खरीद सकता है। इस निवेश के लिए निवेशक के पास डिमैट एकाउंट होना जरुरी है, क्योंकि जूनियरबीस की खरीद-फरोख्त बतौर शेयर ही होती है।
जूनियरबीस की हाल की परफारमेंस इस प्रकार है-
एक फरवरी, 2008 को नेट एसेट वैल्यू- 103.70 रुपये
छह महीनों में प्रतिफल-20.65 प्रतिशत
एक साल में प्रतिफल- 38.98 प्रतिशत
तीन सालों में प्रतिफल- 34.25 प्रतिशत सालाना
ऐसी हाहाकारी सूरत में भी इतना रिटर्न बेहतरीन माना जा सकता है।
टैक्स सेविंग और शेयरों में निवेश के फायदे दोनों ही जिन मुचुअल फंड योजनाओं में उपलब्ध हैं, बिरला इक्विटी प्लान उनमें से एक है।
बिरला इक्विटी प्लान उन फंडों में है, जिनमें एक लाख रुपये तक का निवेश कुल आय में घटाये जाने के योग्य है सेक्शन 80 सी के तहत।
पर निवेशकों को इसमें तीन सालों तक अपना निवेश लाक इन रखना होगा।
इसके हाल के आंकड़े बताते हैं कि 22 फऱवरी, 2008 को इसने पिछले एक साल में 21.72 प्रतिशत का रिटर्न दिया है।
31 जनवरी, 2008 को इस फंड के पास करीब 184.49 करोड़ रुपये की रकम थी निवेशकों की।

मुचुअल फंड में निवेश के लिए ज़रूरी प्रक्रियाये:
निवेश से पहले आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके पास पेन नम्बर ( PAN CARD ) है! यह समझ लीजिये कि आज के युग में आप बिना पेन नम्बर के कोई भी (FINANCIAL)फिनैन्सिअल लेनदेन नही कर सकते ! अगर आप कोई सर्विस क्लास व्यक्ति है तो उचित होगा कि आप मुचुअल फंड में निवेश हेतु अपनी पत्नी या माँ के नाम पर इनवेस्टमेंट करे ! इसका लाभ यह है कि एक तो आप को मुचुअल फंड पर प्राप्त इन्कम पर टैक्स कम देना पड़ेगा और दूसरा लेडीज़ केलिए आयकर कि सीमा पुरुसो के मुकाबले ज्यादा है ! इसके लिए आप उनके नाम पर पेन प्राप्त करने हेतु
आप फॉर्म ४९ अ (49A ) पर आवेदन करे , ४९ अ फार्म आप आईटी पेन सर्विस सेंटर या टिन फसिलिटेशन सेंटर या इन्कोमे टेक्स कि वेबसाइट से डाउन लोड कर सकते है या फ़िर एन एस डी एल कि वेबसाइट से ऑनलाइन भी आवेदन कर सकते है पेन के लिए आपको जरुरी ६० रूपये फीस भी देनी होगी ! अगर आप इश्मे किशी भी परकार कि दिक्कत समझते हो तो किशी टैक्स कंसलटेंट कि सेवाए भी ले सकते है ! एक महीने के भीतर आप को
१५ डिजिट का पेन नम्बर मिल जाएगा ! ध्यान रखे कि आवेदन के साथ निम्नलिखित दोक्युमेंट भी आपको संलग्न करने है :
1. Proof of identity: (इनमे से कोई एक) Submit a copy of any one of the following - School-leaving or matriculation certificate, recognized degree, credit card, bank account statement, passport, ration card, driving license, property tax assessment order, water bill, voter's identity card, certificate of identification signed by a Member of Parliament or Legislative Assembly, Municipal Councillor or Gazetted Officer.
2. Proof of address: (इनमे से कोई एक) A copy of any one of the following will suffice - Bank account statement, passport, voter's identity card, driving license, ration card, employer's certificate, electricity or telephone bill, property tax assessment order, rent receipt or certificate of address signed by a Member of Parliament or Legislative Assembly, Municipal Councillor or Gazetted Officer.

3. Photograph: Individual applicants need to affix a recent stamp-size color photograph.
ध्यान रहे कि अप्लिकेशन में अपना या अपने सम्बन्धी का पूरा नाम लिखे, संछिप्त नाम न लिखे ! यदि पत्नी या माँ के नाम पर पेन अप्प्लाई कर रहे है तो उनके पिता का नाम देना होगा पति का नही !
बस एक बार आपके पास पेन आ गया तो आप मुचुअल फंड में इन्वेस्ट कर सकते है या यदि सीधे शेयर मार्केट में इन्वेस्ट करना चाहते हो तो आपको किशी बैंक जैशे आईसीआईसीआई , HDFC , SBI, UTI etc. में DEMAT अकाउंट खोलना होगा इसका तरीका वही है जैसे आप अपना खाता खुलवाते है ! DEMAT अकाउंट खुलने पर आप ऑनलाइन ट्रेडिंग कर सकते है !
यकीन मानिये, यदि आप धेर्य और अक्लमंदी से अपना पैसा इन्वेस्ट करोगे तो आपको भी कोई एक दिन वारेन बफ्फेत बनने से नही रोक सकता !
धन्यवाद,
गोदियाल