Wednesday, August 25, 2010

बुबै सीख !

आज भिंडी साल पैली की
व बात याद आई,
जब मेरा बुबाजिन मी तै
सीख दिनी छाई,
कि बेटा, ज्वानि की या
तेरी अपणी उमर च,
तु इश्क-मुश्क लड़ो,
भले जै भी गोरी दगडी !
पर जिन्दगी मा अगर तू
सुखी रण चान्दी त,
ब्यो करी सिर्फ
अपणा गढ़वालै छोरी दगडी !!



भिन्डी नि उछल्दन,
अपणी औकात मा राणू ,
बैलबोटम,जींस-पैंट वाऴी का  
चकरु मा नि जाणू,
मुल्कैगी नौनी तेरा दगड़ा,
 टेंट मा भी रै सकदी,
खुश ह्वैकी भात रम्दैगी,
खै सकदी काफ्ली, तोरी दगडी !
अगर सुखी रण चान्दी त,
ब्यो कैलू जब त करी सिर्फ
अपणा गढ़वालै छोरी दगडी !!


पर मिन अपणा बुबै की
एक नि सुणी तबारी,
अर ब्यो करीक लायुं घौर
स्याणी शहरी-देशी  ब्वारी,
अब याद आंदी मी तै
अपणा बुबाजी की बात,
सुबेर-शाम जब बोंज मा
पड़दी जोर की लात,
पछ्तैगी भी कुछ नि मिल्न
अब यीं चटोरी दगडी,
खोपड़ी खजे  जु ब्यो नि करी
कै  गढ़वाली छोरी दगडी !!

सार : इस हास्य कविता का हिन्दी सार यह है कि मेरी जवानी के दिनों में  मेरे  पिताजी  ने मुझे सीख दी थी कि बेटा तमाम उम्र तेरे आगे पडी है, तू  इश्क-मुश्क भले ही  जिस भी लडकी के साथ लड़ा किन्तु शादी सिर्फ अपने मुल्क की  लडकी के साथ ही करना ! मगर हमने पिताजी की बात नहीं  मानी और ....... अब पछताए होत क्या......!

2 comments:

  1. पर मिन अपणा बुबै की एक नि सुणी तबारी,
    अर ब्यो करीक लायुं घौर स्याणी शहरी ब्वारी,
    अब याद आंदी मी तै अपणा बुबाजी की बात,
    सुबेर-शाम जब बोंज मा पड़दी जोर की लात,
    पछ्तैगी भी कुछ नि मिल्न अब यीं चटोरी दगडी,
    खोपड़ी खजै जु ब्यो नि करी गढ़वाली छोरी दगडी !!
    ...kuch kuch garhwali bolundu likhan mein dikkat hundu.. par aaj aapa ki garhwali kavita padhi k bahut achhu lagu...
    bahut shubhkamnan

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  2. Ha haa I love this blog Godiyalji..min bhi apne bubaa ki baat nee mani aur bhugatnu chaun mee bhe..

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